पूरकनाम राम सुख रासी !
मनुजचरित कर अज अबिनासी !!
अर्थार्थ पूर्णकाम, आनंद की राशि, अजन्मा और अविनाशी श्री रामजी मनुष्यों के चरित्र कर रहे थे
उस समय रावणकी विधवा बहिन शूर्पणखा रामजी का सुन्दर रुप देख कर नवयुवती का रूप धारण कर रामजी से कहने लगी की
( तुम सम पुरुष मौसम नारी....)
हे युवराज इस धरती पर तुम जैसा कोई सुन्दर पुरुष नही है और मेरे जैसी कोई सुंदरी नही है चलो हम विवाह कर लेते है।
उस
समय लक्ष्मण जी ने शूर्पणखा को अपमानित करके नाक -कान काट कर वहाँ से
निकाल दिया और रामजी ने खर-दूषण और उनकी सेना को मार गिराया तब शूर्पणखा
रोती बिलखती रावण के पास पहुंची। वह अनेको भड़काऊ शब्द बोलती हुए कहने लकी
की देख रावण ! तुम जैसे कायर की बहन कहलाने से मेरी क्या दसा हुई है।
शूर्पणखा
के वचन सुनते ही सभासद् अकुला उठे। रावण ने शूर्पणखा की बाँह पकड़कर उसे
उठाया और समझाया की तू अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक-कान काट लिए।
(वह
बोली-) अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, जो पुरुषों में सिंह के समान हैं,
वन में शिकार खेलने आए हैं। मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वी
को राक्षसों से रहित कर देंगे।
वे शोभा के धाम हैं, 'राम' ऐसा उनका नाम है ,
राम.... राम.......!
राम का नाम सुनते ही रावण चौक उठा की राम आ गये !
राम आ भी गए !
राम जी का नाम सुन कर रावण मानो मूर्तिमान सा हो गया। वो नी शब्द हो गया मुखसे कुछ बोला नही जाता
उनको अपने मन में ग्लानि होने लगी की अरे ! नारायण नर रूप में आ भी गए और मैं भजन नही कर पाया।
रावण का मन खिन सा हो गया और
शूर्पणखा राम लक्ष्मण और श्री सीता जी का गुणगान किये जा रही है उनका चित निर्मल हो गया , कंठ गदगद हो गया , शरीर पुलकायमान है।
वे
फिरसे कहने लगी की हे दशमुख! जिनकी भुजाओं का बल पाकर मुनि लोग वन में
निर्भय होकर विचरने लगे हैं। वे देखने में तो बालक हैं, पर हैं काल के
समान। वे परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणों से युक्त हैं
दोनों
भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टों का वध करने में लगे हैं और
देवता तथा मुनियों को सुख देने वाले हैं। वे शोभा के धाम हैं, 'राम' ऐसा
उनका नाम है।
हे भाई !
उनके साथ एक तरुणी सुंदर स्त्री है ,-विधाता
ने उस स्त्री को ऐसी रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति (कामदेव की
स्त्री) उस पर निछावर हैं। उन्हीं के छोटे भाई ने मेरे नाक-कान काट डाले।
मैं तेरी बहिन हूँ, यह सुनकर वे मेरी हँसी करने लगे और
मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण , त्रिशिरा सहायता करने आए। पर उन्होंने क्षण भर में सारी सेना को मार डाला।
खर-दूषन
और त्रिशिरा का वध सुनकर रावण सुन सा हो गया। और समझ गया की भगवान श्री
नारायण ( नर रूपमे ) अवतरित हो कर इस धरती पर पधार गए है।
भगवान का नर रूपमे राम अवतार हो गया ये सुन कर
रावण
बड़ा प्रशन्न हुआ पर उनको मन ही मन ग्लानि होने लगी , वह खिन मन से अपने
महल में चल पड़ा वो रास्ते में चलते - चलते विचार करने लगा की भगवान इस
धरती पर अवतरित हो कर आ भी गए और में भजन नही कर पाया , उनसे प्रेम नही कर
पाया क्योकि उन्हें तो प्रेम से ही पाया जाता है पर अब क्या करूँ
( भजन होय नही तामस देहा.. )
अब इस तामसी शरीरसे भजन तो होगा नही पर अब ऐसा क्या करू जिससे उनके हाथो मेरी मुक्ति हो जाये
भगवान अंतर्यामी है रावणके मन की बात समझ गए और सीताजी से कहा
*सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला
*मैं कछु करबि ललित नरलीला
*तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा
*जौ लगि करौं निसाचर नासा
अर्थार्थ
हे प्रिये! हे सुंदर पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सुशीले! सुनो! मैं अब
कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा, इसलिए जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब
तक तुम अग्नि में निवास करो और अपनी छाया रूपी सीता को इस कुटिया में
विराजित कर लो।
श्रीसीता जी राम जी की बात सुनते ही अग्नि में
प्रवेश हो गयी और अपनी छाया रूपी सीता के रूपमे वहां पर प्रविष्ट हो गयी ,
तब लंकापति राव ने अपनी मुक्ति के लिए छाया रूपी श्री सीता जी का हरण किया
था..।
जय श्री राम !!
प्रभु श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ
रावण सभी राक्षसो सहित मारा गया पर सूर्पनखा रामजी से ( चित ) नही हठा
पायी। रामजी है ही ऐसे की जिसके ह्रदय में विराजमान हो जाते है सो हो जाते
है..!
शूर्पणखा रामजी को पति के रूपमे पाने के लिए तपश्या करने लगी
(दस हजार वर्ष ) तक तपश्या की तपश्या से ब्रह्माजी प्रकट हुए , ब्रह्माजी
ने कहा की जिनको पाने के लिए तुम ( तप ) कर रही हो उन श्रीरामजी का ये
मर्यादा पुरषोतम अवतार है , वे तुम्हे इस अवतार में नही अपना सकते पर
तुम्हारी तपश्या निष्फल नही होगी वे द्वापरयुग में जब श्रीकृष्ण अवतार में
आएंगे तब तुम कुब्जा के रूपमे आओगी तब भगवान तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेंगे
उसी शूर्पणखा को ,प्रभु श्रीराम ने श्रीकृष्ण अवतार में सुंदरी कह कर कुब्जा को गोपियो के सामान सुख प्रदान किया.. !!
{जय जय श्री राधे }

डर लागे अरु हांसी आवे अजब जमाना आया रे !
उलटी चाल चली दुनिया में ताते जीव खबराय रे !!जयपुर के एक राजा थे नाम नही लेंगे, उनको एक महाभारत की कथा सुनाई गयी
कथा
कहने वाले पंडितजी ( ग्रस्ति ) थे पंडित जी ने सोचा राजा बहुत धनवान है और
घर मे भी हाथ तंग चल रहा सो राजा के यहाँ से जो दक्षिणा मिलेगी उससे बहुत
दिन तक गुजारा चलता रहेगा पंडितजी ने बड़े भाव से महाभारत की कथा कही पोथी
वही रख कर आ गए।
राजा ने भी अपने परिवार सहित कथा सुनी पर दक्षिणा के
रूप में कुछ दिया नही। कथा कहे हुए महीना बीत गया पर राजा के यहाँ से कोई
खबर नही आई
एक दिन ब्राह्मणी ने कहा की राजा के घर आप कथा तो कह आये
पर दक्षिणा के रूप में राजा ने कुछ दिया नही और पोथी भी राजा के यहाँ पर
ही रख कर आये। ब्राह्मण ने कहा पोथी इसलिए रख आया की जब राजा दक्षिणा के
लिए बुलाएंगे तब ले आऊंगा पर , शायद राजा प्रजा के काम- काज में व्यस्त
रहते है इसलिए भूल गए होंगे पर आज तुमने याद दिला दिया तो आज राजा के यहाँ
मैं खुद ही चला जाता हूँ ,
ब्राह्मण राजा के , राज महल में पहुंचे
सबसे पहले राज महल मे , राजकुमारी मिली , राजकुमारी ने पंडितजी को प्रणाम
किया और कहा पंडजी आपने बहुत कृपा की महाभारत कथा सुना कर आप ने तो हमारी
आखँ ही खोल दी पहले सुना दी होती तो हमारा कल्याण हो जाता ,
पंडितजी ने कहा , अच्छा बेटी ! तुमने क्या सुना महाभारत की कथा में ?
"बोले
पंडीजी ! दाऊजी अपनी बहिन सुबद्रा जी से बहुत प्रेम करते थे पर दाऊजी ने
सोचा की अभी मेरी बहिन बहुत भोली है , अधिक स्नेह के कारण उन्होंने विवाह
की कोई खास चिंता की नही उसी बीच सुभद्राजी अर्जुन के साथ भाग गयी।
अब हमारे माता पिता भी हमारे विवाह के लिए कोई ख़ास सोच नही रहे है तो अब मैं भी कोई योग्य राजकुमार देख कर उनके साथ भाग जाउंगी।
पंडितजी ने अपना सिर पिटा की हे राम ! इसने पूरी महाभारत कथा से एक यही शिक्षा ली।
पंडित जी आगे बड़े और रानी मिली ,
रानी
ने प्रणाम कर के कहा , महारज ! आप पहले कथा कहते तो मेरा तो भाग्य ही बदल
जाता पर अब तो बहुत समय निकल गया और मेरी जवानी भी ढल गयी।
पंडित जी बोले अच्छा , रानी जी ! कहो ! आपने महाभारत की कथा से क्या शिक्षा ली ?
"बोले
महाराज ! द्रोपदी के पांच पति थे पांच विवाह हुए इसलिए वो पंच कन्या में आ
गयी और मैं तो अंधेरे में रह गयी , एक पति से ही संतुष्ट रह गयी।
पंडितजी रानी की बात सुन कर चुप चाप जल्दी जल्दी पाँव उठाने लगे और मुख से राम राम कहते
आगे बड़े और अब राजा का पुत्र राजकुमार मिला।
राजकुमार पंडितजी को प्रणाम करते हुए कहने लगा , पंडितजी ! आपने महाभारत की कथा सुना कर हमारे भाग्य का रास्ता ही खोल दिया ,
पंडित जी " अच्छा ! आपने क्या प्रेरणा ली ?
बोले
महारज ! कंस सब तरह से राज गद्दी के योग्य था पर उनके पिता ने उनको नालायक
जान कर राज गद्दी, सोप नही रहे थे , तब उसने अपने पिता उग्रसेन को कारागृह
में बंध कर अपने बल के आधार पर राज गद्दी पर बैठ गया , अब मैं भी सोच रहा
हूँ की कुछ षडियंत्र करके पिता जी को हटा कर मैं भी राज गिद्दी पर विराजित
हो जाऊ।
पंडित जी के मन में खिन्नता होने लगी की , अरे ! ये क्या दुस्स प्रभाव पड़ा |
पंडितजी
विचार करते करते राज दरबार में पहुंचे जहा राजा विराज रहे थे , राजा ने
राज गद्दी से उठ कर पंडितजी का सत्कार करते हुए कहा आईये पंडितजी आपने
महाभारत कथा सुना कर हमारा बहुत सारा धन खर्च होने से बचा दिया पंडित जी
खिन्न भाव से बोले अच्छा ! महाराज आपने महाभारत की कथा से क्या प्रेरणा ली ?
"बोले
महाराज ! आज तक हम बिना सोचे समझे ही अपना धन लुटाते रहे पर जब से महाभारत
कथा सुनी तब से हमारी तो बुद्धि ही ठिकाने आ गयी हमारा बहुत सारा धन खर्च
होने से बच गया
अच्छा ! वो कैसे ?
बोले जब कौरवो की सभा में
शांतिदूत बन कर श्री कृष्ण पधारे तब दुर्योधन ने कहा केशव ! बिना उद्ध के
एक सुई के ( नोक ) के बराबर भी पांडवो को भूमि देनेवाला नही हूँ , अब
पांडवो को कुछ चाहिए तो युद्ध कर ले......।
और अब आप को भी कुछ दक्षिणा चाहिए तो हमसे युद्ध कर लो फिर जो चाहो जो ले जाओ
पंडितजी ने कहा महाराज ! आप हमारी पोती वापिस कर लीजिये
जान बची तो लाखों पाये !
लोट के बुद्धू घर को आये !!
ये हकीकत घटना है जयपुर के राजा की....!
आज भी लोग ग्रंथो मे से अपने मतलब की बात निकाल
लेते है और उन पर दोसारोपित करते रहते है पर उसका परिणाम क्या होता है ये
नही विचारते ,
अब
में आप सज्जनो से पूछती हूँ , क्या महाभारत ग्रन्थ में यही शिक्षा है? जो
अच्छाईओ को छोड़ बुराईयो का संग्रह करे ? जिसे पंचम वेद कहा गया है उस में
जीव के कल्याण के सिवाय कुछ है ही नही |
जिसमे से गीता जैसा शास्त्र निकला ? जो समय को
साक्षी रख कर भगवान ने प्रत्येक जीव के कल्याण के लिए मुक्ति का मार्ग
बताया आज वो ग्रथ घर मे रखने से लोग कतराते है की महाभर जैसा ग्रथ घर में
रखेंगे तो कही हमारे घरमे महाभारत न छिड़ जाये पर फिर भी आज हर परिवार में जंग
छिड़ी हुई है , कही बाप बेटे के बीच तो कहि सास बहु के बीच , कही भाई - भाई के
बीच तो कही पति - पत्नी के बीच .. इद्यादि सब जंग में फसे हुए है कोई बचा हुआ
नही है।
{ जय जय श्री राधे}
श्री राधा कृष्ण के विवाह की कथा!
एक दिन नन्दबाबा ने सोचा की जब से लाला भयो है तब से गो चरावे नही गयो आज गो चरावे को जाता हूँ ,
बाबा , श्री बालकृष्ण लाल को गोदी में ले कर चल पड़े वे अपने लाला को लाड
लडाते - लड़ाते गोए चरते हुए बहुत दूर निकल गए धीरे - धीरे भाण्डीर - वन जा
पहुँचे
जहा थोड़ी ही देर में श्री कृष्ण की इच्छा से वायु का वेग अत्यंत
प्रखर हो उठा ,
आकाश मेघों की घटा से आच्छादित हो गया तमाल और कदम्ब
वक्षो के पल्ल्व टूट - टूट कर गिरने , उड़ने और अत्यंत डरावने उत्पादन करने
लगे उस समय महान अन्धकार छा गया। नंदनंदन सामान्य बालक की भांति डर कर रोने
लगे।
अपने लाला को डरते हुए रोते देख बाबा को भी भय लगने लगा तब
वे शिशु को गोद मे लिए और उनको गर्गचार्यजी की कई हुई बात याद आई तब बाबा
ने श्री राधा जी को याद किया,
उसी समय करोडो सूर्यो के समूह की सी दिव्य
दिप्ति उदित हुई जो सम्पूर्ण दिशाओ में व्याप्त थी उस दिव्य प्रकाश में
बाबा ने श्री राधाजी को देखा।

श्री राधाजी पहले ही सोलह शृंगार कर प्रकट हुई थी।
श्रीराधा जी के दिव्य तेज से अभिभूत हो बाबा ने तत्काल उनके सामने मस्तक
झुकाया और हाथ जोड़कर कहा-राधे ! ये साक्षात पुरषोतम है और तुम इनकी मुख्य
प्रणवल्लभा हो , यह गुप्त रहस्य में गर्गजी के मुख से सुनकर जानता हूँ।
हे राधे ! अपने प्राणनाथ को मेरे अंक से ले लो ये बादलो की गर्जना से डर
गये है इन्होने लीलावश यहाँ प्रकृति के गुणों को स्वीकार किया है इसिलए
इनके विषय में इस प्रकार भय भीत होने की बात कही गयी है।
नन्दबाबा ने कहा की तुम अपने प्राणनाथ को मेरे अंग से ले लो और अपने घर जाओ।
बाबा के कहने का तात्पर्य यह था की तुम अपने प्रीतम को साथ ले कर (निकुंज)
में जाओ क्यों की घर उसी को कहते है जहा ग्रहणी होती है , अब राधाजी
ग्रहणी है तो जहा ( राधा कृष्ण ) होंगे वो राधा जी का घर हो ही गया।
राधाजी ने अपने प्राणनाथ को बाबा से ले कर अपने अंग में भर लिया और
श्रीकृष्ण राधाजी के छाती से एक शिशु की भांति चिपक गये , फिर जब , नन्दराय
जी श्रीराधा जी को प्रणाम कर के चले गए तब श्रीराधा जी भी भाण्डीर वन में
निकुंजकी लताओं में गयी।
वहा की भूमि अत्यंत सुशोभित थी क्योकि
जहा (श्रीराधा कृष्ण का विवाह ) हो रहा हो वहाँ पर पृथ्वी नाच उठी और अपना
दिव्य रूप प्रकट कर अपने आपको सजाने के लिए प्रकति को आदेश दे दिया
यमुना जी भी सुन्दर शृंगार कर वहां उपस्थित हो गयी , अन्य नदियाँ और सरोवर
भी अपने सौंदर्य को प्रकट कर वह उपस्थित हुए , वहाँ की सजावट देखे कैसे
?क्यों की हमारी नजर ही नही टिकती वहाँ की सजावट जो प्रकृति ने की उसकी
शोभा वर्ण करने का सामर्थ्य मुझमे नही है इसलिए उस अध्भुत दिव्य सुन्दर
भूमि को मैं साष्टांग प्रणाम करती हूँ।
वहां की सुन्दर सोभा को
देख श्री श्यामसुन्दर भी ललचा गए उस दिव्यधाम निकुंज की शोभाकला अवतरण होते
ही अपने शिशु अवस्था को छोड़ साक्षात पुरषोतम घनश्याम भगवान श्री कृष्ण
किशोरावस्था के अनुरूप दिव्य देह धारण कर श्री राधाजी के समुख खड़े हो गए।
उनके श्री अंगों पर पीताम्बर , हाथ मे बंशी , कानो में कुंडल , बाहो मे
बाजूबंद , गले में.. , कंठ में सुन्दर आभूषण सोभा पा रहे थे , श्रीकृष्ण भी
दुल्ल्हा सा ही रूप धारण कर प्रकट हुए थे।
उन्होंने हँसते हुए अपने प्रियतमा श्रीराधा जी का हाथ अपने हाथ में थाम लिया और उनके साथ ( विवाह - मंडप में प्रविष्ट हुए )
उस मंडप में विवाह की सब सामग्री संग्रह करके रखी गयी थी , मेखला , कुशा ,
सप्तमत्तिका और जल से भरे कलस आदि उस मंडप की शोभा बढ़ा रहे थे।
वहाँ एक श्रेष्ट सिंघासन प्रकट हुआ , जिस पर वे दोनों प्रिया प्रियतम एक -
दूसरे से सट कर विराजित हो गए और अपनी दिव्य शोभा का प्रसार करने लगे
वे
दोनों एक दूसरे से मीठी - मीठी बाते करते हुए मेघ और विदित की भांति पानी
प्रभा से उद्दीप्त हो रहे थे , उसी समय देवताओ में श्रष्ट भगवान ब्रह्माजी
आकाश से उतरकर भगवान श्री कृष्ण के सन्मुख आये और उन दोनों के चरणो मे
प्रणाम करके हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे........!!
उसके बाद श्रीराधावल्लभ का विवाह श्री ब्रह्माजी ने विधिवत से सम्पन करवाया , सभी देवी देवताओ ने पुष्पो की वर्षा की
विवाह सम्पन होने के बाद सभी देवी देवता श्री राधा जी को प्रणाम कर के
अपने अपने स्थान चले गए और प्रिया प्रियतम अपने ( निकुंज ) मे पधार गए , वह वे एक दूजे का शृंगार करने लगे पहले भगवान श्री कृष्ण ने अपनी प्रियतमा का अपने हाथो श्रंगार किया , सुन्दर वेणी बनायीं , कजरे लगाए , नेत्रोमे कालज की पतली रेखा खीच दी तथा उत्तमोत्तम रत्तनो और फूलो से भी उनका श्रंगार किया राधाजी का पूर्ण शर्बगर् होने पर ,
जैसे ही श्रीराधा जी अपने प्रियतम का श्रंगार करने लगी उसी क्षण श्री कृष्ण अपने किशोरावस्था को त्याग कर छोटे से बालक बन गए , नंदबाबा ने जिस शिशुको जिस रूप में श्रीराधा जी के हाथ में दिया था उसी रूप में वे धरती पर लौटने लगे और भय से रोने लगे।
श्रीहरि को इस रूप में देख कर श्रीराधा जी तत्काल विलाप करने लगी और बोली हरे ! मुझपर माया क्यों फैलाते हो ? इस प्रकार विषादग्रस्त होकर रोती हुई श्रीराधा से सहसा आकाशवाणी ने कहा
राधे ! इस समय सोच मत करो तुम्हारा मनोरथ कुछ काल के पश्चात पूर्ण होगा इतना कह कर आकाशवाणी भी चुप हो गयी श्री राधा जी अपने प्राणधन को ले कर नन्द बाबा के घर श्री यशोदा जी के हाथो सोप आई....!!
{ जय जय श्रीराधे }
श्रीसीता स्वयंवर
श्री सीता राम , लक्ष्मण उर्मिला , भरत जी मांडवी और शत्रुघ्न श्रुतकीर्ति के शुभ विवाह का भजन !
आज मिथला नगरिया निहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!
माथे मणि मोरिया कुंडल सोहे कानवा !
कारें कारें कजरारे जुल्मी नयनवा !!
लालचंदन सोहे इनके भाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!
सावर सावर गोरे गोरे जोड़ियां जवान है !
आंखियां देखलि सुनलिनी कान है !!
जुग जुग जोड़ी जीवे बे मिसाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कामल सखियाँ !!
गगन मगन आज मगन धरतीयाँ !
देख देख दूल्हा जीके सावरी सुरतियाँ !!
बाल , वृद्ध , नर , नारी सब बेहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!
आज मिथला नगरिया निहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ!!
{ जय जय श्री राधे }
प्रभु श्रीराम की नरलीला !!
चम्पा - चमेली तुही बतादे !
सीता कहाँ पुकारे राम.... ?
रावण
ने जब मायावी सीताजी का हरण किया उस समय भगवान श्रीराम नर लीला करते हुए
साधारण मनुष्यो की भांति , विलाप करने लगे-) हा गुणों की खान जानकी! हा
रूप, शील, व्रत और नियमों में पवित्र सीते... !
और वृक्षों की पंक्तियों से पूछते हुए चलते है ..
* हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
भावार्थ:-
हे पक्षियों! हे पशुओं! हे भौंरों की पंक्तियों! तुमने कहीं मृगनयनी सीता
को देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरों का समूह, प्रवीण कोयल,॥
प्रभु
श्रीराम बाकि रास्ते में तो लक्ष्मण जी को अच्छी - अच्छी कथाये सुनाते
चलते है , की हे भरत ! तुम सावधान हो कर सुनो, जिसका मेरा गुण गाते समय
शरीर पुलकित हो
जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और
काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ..
अनेको ज्ञानोपदेश देते है पर जैसे ही ऋषि मुनियो के आश्रम देखते है , वे
पुरषोतम भगवान जोर - जोर से रोने लग जाते है। एक साधारण मनुष्य की भाति
पत्नी के वियोगमे रुदन करने लगते है , उनके पीछे - पीछे चलते हुए लक्ष्मण
जी को भी रोना पड़ता है , फिर जैसे कुछ दूर गए तो रोना बंद, और ज्ञानोपदेश
शुरु।
लक्ष्मण जी ने सोचा की भैया बाकि रास्ते तो अनेको ज्ञानोपदेश
देते चलते है पर जैसे ही ऋषियों के आश्रम देखते है ये साधारण मनुष्यो की
भाति रोने क्यों लग जाते है ?
लक्ष्मण जी इस बात को समझ नही पाये पर भगवान उनके लिए रो रहे है जिनको अग्नि में सुरक्षित रख आये है।
यहाँ भगवान ने सीता मईया से कहा की ,
"सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥
अर्थात:-
हे प्रिये! हे सुंदर पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सुशीले! सुनो! मैं अब
कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा, इसलिए जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब
तक तुम अग्नि में निवास करो।
जब सीता जी का हरण हुआ ही नही तो रुधन क्यों ? इसपर
भक्तो
के भाव है की भगवान ऋषियों के आश्रम के आगे से साधारण मनुष्य की भाति
पत्नी के वियोग में इसलिए रुधन करते हुए चल रहे है , मानो ये सिद्ध ऋषियों की
पहचान करते हुए चल रहे हो।
कुछ ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य बने बैठे है ,
कुछ पत्नी के साथ रहते है ,
और कुछ ये सोच रहे है की पत्नी का होना तो जरुरी है ताकि समय पर भोजनादि मिलता रहे।
अब
भगवान को पत्नी के वियोगमे रोते देख कुछ ऋषि बोले अरे भाई ! देखो - देखो
ये राजा सम्राट दशरथ के पुत्र कौशल्यानंदन होते हुए भी अपनी पत्नी के
वियोग में रो रहे है फिर हमतो ठहरे साधारण मनुष्य कही हमारी पत्नी का भी
कोई अपहरण न करले सो चौकन्ने हो जाओ। उनका चित भगवान से कुछ हठ कर
स्त्रियों में लग गया , वे नाम के ऋषि मुनि रह गए।
कुछ ऋषि रामजी को
देख कर ये सोचते थे की अरे भाई ! देखो स्त्री का होना कितना आवश्यक है , ये
भगवान होते हुए भी इनको स्त्री की कितनी आवश्यकता है फिर हमतो ठहरे मृत्युलोक के
साधारण मनुष्य इसलिए हमे भी विवाह कर लेना चाहिए वे ऋषि मुनि अधकचरे
ब्रह्मचर्य थे जिनका मन भोगविलास में रमणित हो रहा था।
कुछ ऋषियों
ने सोचा की ये साक्षात परमब्रह्म परमात्मा होते हुए भी एक साधारण मनुष्य की
भाति पत्नी के वियोग मे पड़े हुए है , मानो ये हमको संकेत दे रहे है की तुम
ब्रह्मचर्य व्रत करते हुए भी पत्नी में आशक्ति रखते हो तो सोचलो तुम्हे भी
मेरी तरह रोना पड़ेगा।
उस समय कहते है की जो ऋषि मुनि अपनी पत्नियों के साथ रह रहे थे उन सिद्ध ऋषियों ने अपनी पत्नियों को आश्रमसे बाहर निकाल दिया।
अब सोचने की बात है की भगवान ने ऐसा क्यों किया भगवान को ऐसा संकेत नही देना चाहिए।
हम
साधारण मनुष्य के भीतर ऐसे ही सवाल उत्पन होंगे पर जो भगवतशरणागत हो गए
जिन्होंने भगवान के नाम का सुहाग का चोला पहन रखा हो , जो संत पोशाक होती
है , वे सोचते है हमको कुल्टा स्त्री नही बनना , हम भगवान की पतिव्रता नारी
ही रहना चाहते है , क्योंकी भगवान जगतपति है , उस नाते ये जितने भी जीव है
सब भगवान की स्त्रीया है , विश्व भरका दूल्हा तो एक ठाकुरजी ही है ,
ऐसे
महात्माओ के लिए भगवान को छोड़ कर और किसी की कोई आवश्यकता नहीं।
भगवान
का भी अपने प्राण प्यारे भक्तो के प्रति ऐसा ही भाव होता है की जो निष्काम
भाव से मुझे भजता है जो अकिंचन हो , जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई,
पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो उन्हें मेरी प्राप्ति सहज ही
हो जाती है , फिर वो मुझमे और मैं उनमे रमण करने लग जाते है , उस आत्मा में
और मुझ परमात्मा में कोई अंतर नही रह जाता।
भगवन ओरु भगतन में अंतर निरंतर नाही !
भगवन ही भगतनका रूपधरी आये है !!
भगवान और भक्तके प्रति ऐसे ही मेरे भाव है.. कुछ गलती हो तो क्षमा कीजियेगा !
जय श्री राम !!
{ जय जय श्री राधे }
हरी जन तो हारे भले जितण दो संसार !
हारे हरिपुर जावसी जीते यमके द्वार !!एक बार सब लंकावासी मिल कर रावण के पास गए और बोले महाराज ! आप तो रामजी के प्रबल विरोदी है और आप के भाई विभीषण जी तो रामजी के परम भक्त है , वे सब दिन राम नाम की रट लगाये रहते है और पुरे घरमे भी राम राम लिखा रखा है , और तो और हाथ में झोली माला ले कर सब दिन राम राम करते रहते है और महाराज ! घरमे भी राम नाम का कीर्तन होता है ,
"श्री राम जय राम जय जय राम....
लंका वासियो ने रावण को खूब भड़का दिया।
रावण क्रोध से तिलमिला उठा और कहा विभीषण को बुलाओ ,
विभीषण जी आये और कहा ये लोग क्या कहते है तुम्हारे घरमे राम राम लिखा है
"बोले हाँ ! लिखा है
' बोले हाथमे झोली है , क्या जपते हो ?
"बोले ' राम राम..
विभीषणजी की बात सुन कर रावण तिलमिला कर बोला ,
' तुम मेरे शत्रु का नाम जपते हो ?
विभीषणजी "बिलकुल नही.....
विभीषण जी ठीक ही तो कह रहे थे रामजी किसीके शत्रु है ही नही , वे तो प्रत्येक जीव के हितैसी है।
रावण बोला फिर राम - राम क्यों जपते हो ?
विभीषणजी ने सोचा की सच कहूँगा तो ये दुष्ट मेरे भजन में बाधा पहुचायेगा
विभीषणजी बोले " महाराज ! ये शिकायत करने वाले नाम के रहष्य को नही समझते , मैं तो मेरे भईया भाभी का नाम जपता हूँ पर , क्या कहे ! ये चुगलखोर नाम की महिमा नही समझ पाते , मैं अपने भईया भाभी का भक्त हूँ इसलिए राम नाम जपता हूँ।
रावण बोला राम राम जपने से तुम मेरा और तेरे भाभी का भक्त कैसे हुआ ?
"बोले महाराज ! आप त्रिलोकी के विजेता हो कर भी मंद्बुधियो की भांति बात करते है।
" आप का नाम रावण है की नही ?
' बोले हाँ ! है
" बोले भाभीका नाम मंदोदरी है की नही ?
' बोले हाँ ! है
अब आप भी ( राम नाम ) का रहस्य समझ लीजिये।
( रा माने रावण )
( म माने मंदोदरी ) आपका और भाभी का पूरा नाम लेनेमें कठिनाई होती है इसलिए संगसेप में ही ( राम नाम ) जप लेता हूँ।
रावण ने विभीषण जी को ह्रदय से लगा लिया और कहा की भाई हो तो विभीषण जैसा।
'प्रसन्न हो कर बोला , हाँ ! विभीषण इस भावसे तुम चाहे जितना राम राम करो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।
विभीषण जी झूट बोल रहे थे वे केवल राम भक्त है भईया भभीसे उनको क्या लेना देना पर रावण से पिंड छुड़ाने के लिए रावण को प्रसन्न करने वाली बात कही।
तात्पर्य यह है की कोई जीव भगवतशरणागत हो जाये और किसी भी तरह की बाधा आये तो उन बाधाओ को लाग कर किसी भी युक्ति से भगवत शरणागत हो जाना चाहिए , किसी भी युक्ति से केवल भगवान के हो जाओ !
जे रति होइ सियाराम सु !
सुमिरत रात दिवस तन, मन सु !!
, एक ही ध्यान रहे , हम भगवान के है और एक भगवान ही हमारे अपने है। { जय जय श्री राधे }
संत श्री कबीरदासजी के प्राकट्य की कथा भक्ति बीज पलटे नही जो जुग जाये अनंत !
उच्च - नीच कुल उपजे रहे संतको संत !!
एक सिद्ध महात्मा थे श्री रामानन्दचार्य जी उन्ही महात्मा का एक शिष्य था ब्राह्मण जो नित्य उनकी सेवा में उपस्थित रहता था।
एक दिन उन ब्राह्मण को किसी आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ा उन ब्राह्मण ने श्री रामानन्दचार्य जी की सेवा में अपनी पुत्री को भेजा
उस ब्राह्मण कन्या ने बड़े भावपूर्वक समस्त कार्य किया , जब घर जाने लगी तो श्रीस्वामीजी के श्रीचरण -कमलों में प्रणाम किया तो श्री स्वामीजी ने सहज भाव से आशीर्वाद दिया - पुत्रवती भव।
यह सुनकर ब्राह्मण कन्या संकुचित हो गयी और हाथ -जोड़कर बोली , महाराज ! मैं तो अभी क्वांरी हूँ। ब्राह्मण कन्या की बात सुन कर स्वामी श्री रामानंदचार्य भी किंचित विचार में पड़ गए।
इसी बीच श्री विष्णु भगवान का आदेश ले कर करुणामय भगवती श्री लक्ष्मी जी कलयुग के जीवो पर दया कर भू - लोक में पधारी उन्होंने विचार किया की कलयुग के लोगो का कल्याण तभी संभव है जब किसी समर्थ भक्त का अवतार हो।
इसी चिंता में विनिमग्न श्री लक्ष्मीजी घूमती - फिरती ( काशी में ) श्री रामानन्दचार्य जी के पास आई।
यहाँ आने पर देखा तो श्री स्वामीजी भी ब्राह्मण कन्या को आशीर्वाद देकर विचारमग्न ही थे।
तब लक्ष्मीजी ने ब्राह्मण कन्या को एक तुलसीपत्र दिया और स्वामीजी ने भी कुछ पुष्प प्रसादी दी। लक्ष्मीजी ने तुलसीपत्र देते हुए कहा की तुम स्वामीजी की पुष्प प्रसादी एवं ये तुलसीपत्र लो , और अपनी झोली में भर लो इससे श्रीस्वामीजी का वरदान भी व्यर्थ नही होगा और तुम्हारा कन्यात्व भी सुरक्षित रहेगा।
ब्राह्मण कन्या ने तुलसीपत्र और पुष्प प्रसादी अपने आँचल में ले ली, कुछ दूर चलने पर उसे वजनसा मालूम हुआ तो विचार की स्वामीजी ने ( वा लक्ष्मीजी ) ने तो फूल ही दिया था फिर यह इतना भारी क्यों लग रहा है ? जब उसने देखा तब समझा की यह तो पुष्पो के स्थान पर एक परमदिव्य सुन्दर ( शिशु ) प्रकट हो गया है।
लोक - लज्जावश वह ब्राह्मण- कन्या उस शिशु को लहरतारा - तालाब के तट पर रखकर चली गयी। (1455 ज्येष्ठ पूर्णिमा सोमवार ) के दिन ही कबीरजी का प्राकट्य हुआ उस दिन दैवयोगवश नीरू - नीमा नाम के जुलाहा दम्पति उसी मार्ग से कही जा रहे थे।
नीमा को प्यास लगी थी वह जब लहरतारा में जल पिने गयी तो उसने , इस परम सुन्दर शिशु को कमल पत्रों पर खेलते देखा।
उसके हृदय में मातृत्व भाव जगा , वातसल्य उमड़ा , उसने शिशु को गोद में उठा लिया अब तक उसकी गोद भी पुत्र से खाली ही थी , उसने शिशु को लेकर नीरू को दिखाया। नीरू ने प्रथम तो आनाकानी की परन्तु बाद में पत्नी का अनुग्रह देखकर घर ले चलने की अनुमति दे दी , इस प्रकार श्री कबीरदासजी का पालन पोषण इन्ही नीरू - नीमा के हाथो हुआ..| भक्तमाल ग्रन्थ में एक पद भी आता है
यथा वन्दौ श्रीप्रह्लाद जिन ,धार्यो रूप कबीर।
कलिमद मर्दन वीरवर सिद्धि समर रणधीर।।
इस पद के अनुसार
भक्त शिरोमणि श्री प्रह्लादजी के अवतार कबीरदासजी ही है
{ जय जय श्री राधे }