Thursday, 24 April 2014

           || महाभारत में हनुमानजी का आवेश ||

जब महाभारत युद्ध हो रहा था उस समय भीमसेन चिंता कर रहे थे की राजा युधिष्ठर बाणो से  बहुत आहत हो गए थे उन्हें देखने अर्जुन गए है वे भी कही दिख नही रहे है , देवताओंसे यही प्रार्थना करता हूँ की वे सुरक्षित हो।

उतने में उनका सारथि विशोकने हंसकर कहा महाराज ! आप चिंतित न हो , श्रीकृष्ण आप के पक्षमे है और आज कल देवताओ को आप सबकी  प्रार्थना तत्काल सुन लेने का अभ्यास हो गया है , आपकी मनोकामना पूर्ण हो गयी ,  वे देखिये ! आप अपने अर्जुनके धनुष का भयंकर जयघोष सुन सकते है , और वह देखिये ध्वजदण्ड के साथ बैठा रहने वाला ( वानर पवनपुत्र ) ध्वजापर चढ़ कर चारो और देख रहे है , उसकी दृष्टि से दूसरे तो दूर पर मैं स्वयं बहुत डर रहा हूँ।

ऐसा पढ़ने में आता है की अर्जुन के रथ पर बैठे हनुमानजी कभी कबार खड़े हो कर कौरवो की सेना की और घूर कर देखते तो उस समय कौरवो की सेना तूफान की गति से युद्ध भूमि को छोड़ कर भाग निकलती , हनुमानजी की दृष्टि का सामना करने का साहस किसी में नही था , उसदिन भी ऐसा ही हुआ था जब कर्ण और अर्जुन के बीच युद्ध चल रहा था।

कर्ण अर्जुन पर अत्यंत भयंकर बाणो की वर्षा किये जा रहा था उनके बाणो की वर्षा से श्रीकृष्ण को भी बाण लगते गए , अतः उनके बाण से श्रीकृष्ण का कवच कटकर गिर पड़ा और उनके सुकुमार अंगोपर लगने लगे , रथकी छत पर बैठे (पवनपुत्र हनुमानजी ) एक टक निचे अपने इन आराध्य की और ही देख रहे थे।
श्रीकृष्ण कवच हीन हो गए थे , उनके श्री अंगपर कर्ण निरंतर बाण मारता ही जा रहा था , हनुमानजी से यह सहन नही हुआ , आकस्मात् वे उग्रतर गर्जना करके दोनों हाथ उठाकर कर्णको मार देने के लिए उठ खड़े हुए।

 हनुमानजी की भयंकर गर्जना से ऐसा लगा मानो ब्रह्माण्ड फट गया हो , कौरव- सेना तो पहले ही भाग चुकी थी अब पांडव पक्षकी सेना भी उनकी गर्जना के भय से भागने लगी , हनुमानजी का क्रोध देख कर कर्णके हाथसे धनुष छूट कर गिर गया।

भगवान श्रीकृष्ण तत्काल उठकर अपना दक्षिण हस्त उठाया और हनुमानजी को स्पर्श करके सावधान किया -- रुको ! तुम्हारे क्रोध करने का समय नही है।
श्रीकृष्णके स्पर्श से हनुमानजी रुक तो गए किन्तु  उनकी पूछ खड़ी हो कर आकाश में हिल रही थी , उनके दोनों हाथोंकी मुठियां बंध थीं , वे दाँत कट- कटा रहे थे और आग्नेय नेत्रों से कर्णको घूर रहे थे , हनुमानजी का क्रोध देख कर कर्ण और उनके सारथि काँपने लगे  और स्वेद धरा चल रही थी दोनों ने दृष्टि निचे कर रखी थी।

हनुमानजी का क्रोध शांत न होते देख कर श्रीकृष्ण ने कड़े स्वर में कहा हनुमान ! मेरी और देखो , अगर तुम इस प्रकार कर्णकी और कुछ क्षण देखोगे तो कर्ण तुम्हारी दृष्टि से ही मर जाएगा।
यह त्रेतायुग नही है।  तुम्हारे पराक्रमको तो दूर तुम्हारे तेज को भी कोई यहाँ सह नही सकता।  तुमको मैंने इस युद्धमे शांत रहकर बैठने को कहा है।
फिर हनुमानजी ने अपने आराध्यदेव की और निचे देखा और शांत हो कर बैठ गए ,

    { जय श्री राधे राधे }

Wednesday, 2 April 2014

 गणगोर कथा
एक बार भगवान शंकर तथा पार्वतीजी नारदजी के साथ भ्रमण को निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच गए। उनके आगमन का समाचार सुनकर गाँव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं।

भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफी विलंब हो गया। किंतु साधारण कुल की स्त्रियाँ श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही थालियों में हल्दी तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुँच गईं। पार्वतीजी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार करके सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं। तत्पश्चात उच्च कुल की स्त्रियाँ अनेक प्रकार के पकवान लेकर गौरीजी और शंकरजी की पूजा करने पहुँचीं। सोने-चाँदी से निर्मित उनकी थालियों में विभिन्न प्रकार के पदार्थ थे।

उन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने पार्वतीजी से कहा- 'तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी?'

पार्वतीजी ने उत्तर दिया- 'प्राणनाथ! आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। इसलिए उनका रस धोती से रहेगा। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूँगी। यह सुहाग रस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यवती हो जाएगी।'
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जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वतीजी ने अपनी उँगली चीरकर उन पर छिड़क दी। जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। तत्पश्चात भगवान शिव की आज्ञा से पार्वतीजी ने नदी तट पर स्नान किया और बालू की शिव-मूर्ति बनाकर पूजन करने लगीं। पूजन के बाद बालू के पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया।

प्रदक्षिणा करके नदी तट की मिट्टी से माथे पर तिलक लगाकर दो कण बालू का भोग लगाया। इतना सब करते-करते पार्वती को काफी समय लग गया। काफी देर बाद जब वे लौटकर आईं तो महादेवजी ने उनसे देर से आने का कारण पूछा।

उत्तर में पार्वतीजी ने झूठ ही कह दिया कि वहाँ मेरे भाई-भावज आदि मायके वाले मिल गए थे। उन्हीं से बातें करने में देर हो गई। परंतु महादेव तो महादेव ही थे। वे कुछ और ही लीला रचना चाहते थे। अतः उन्होंने पूछा- 'पार्वती! तुमने नदी के तट पर पूजन करके किस चीज का भोग लगाया था और स्वयं कौन-सा प्रसाद खाया था?'
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स्वामी! पार्वतीजी ने पुनः झूठ बोल दिया- 'मेरी भावज ने मुझे दूध-भात खिलाया। उसे खाकर मैं सीधी यहाँ चली आ रही हूँ।' यह सुनकर शिवजी भी दूध-भात खाने की लालच में नदी-तट की ओर चल दिए। पार्वती दुविधा में पड़ गईं। तब उन्होंने मौन भाव से भगवान भोले शंकर का ही ध्यान किया और प्रार्थना की - हे भगवन! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूँ तो आप इस समय मेरी लाज रखिए।

यह प्रार्थना करती हुई पार्वतीजी भगवान शिव के पीछे-पीछे चलती रहीं। उन्हें दूर नदी के तट पर माया का महल दिखाई दिया। उस महल के भीतर पहुँचकर वे देखती हैं कि वहाँ शिवजी के साले तथा सलहज आदि सपरिवार उपस्थित हैं। उन्होंने गौरी तथा शंकर का भाव-भीना स्वागत किया। वे दो दिनों तक वहाँ रहे।

तीसरे दिन पार्वतीजी ने शिव से चलने के लिए कहा, पर शिवजी तैयार न हुए। वे अभी और रुकना चाहते थे। तब पार्वतीजी रूठकर अकेली ही चल दीं। ऐसी हालत में भगवान शिवजी को पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारदजी भी साथ-साथ चल दिए। चलते-चलते वे बहुत दूर निकल आए। उस समय भगवान सूर्य अपने धाम (पश्चिम) को पधार रहे थे। अचानक भगवान शंकर पार्वतीजी से बोले- 'मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूँ।'

'ठीक है, मैं ले आती हूँ।' - पार्वतीजी ने कहा और जाने को तत्पर हो गईं। परंतु भगवान ने उन्हें जाने की आज्ञा न दी और इस कार्य के लिए ब्रह्मपुत्र नारदजी को भेज दिया। परंतु वहाँ पहुँचने पर नारदजी को कोई महल नजर न आया। वहाँ तो दूर तक जंगल ही जंगल था, जिसमें हिंसक पशु विचर रहे थे। नारदजी वहाँ भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वे किसी गलत स्थान पर तो नहीं आ गए? मगर सहसा ही बिजली चमकी और नारदजी को शिवजी की माला एक पेड़ पर टँगी हुई दिखाई दी। नारदजी ने माला उतार ली और शिवजी के पास पहुँचकर वहाँ का हाल बताया।

शिवजी ने हँसकर कहा- 'नारद! यह सब पार्वती की ही लीला है।'

इस पर पार्वती बोलीं- 'मैं किस योग्य हूँ।'

तब नारदजी ने सिर झुकाकर कहा- 'माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती समाज में आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत का ही प्रभाव है। संसार की स्त्रियाँ आपके नाम-स्मरण मात्र से ही अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है?' महामाये! गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा सार्थक होता है।

आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं आशीर्वाद रूप में कहता हूँ कि जो स्त्रियाँ इसी तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगलकामना करेंगी, उन्हें महादेवजी की कृपा से दीर्घायु वाले पति मिलेगा।

 { जय श्री राधे राधे }


Tuesday, 19 November 2013

   कलयुग काली कोटरी , जा को चाहे ना कोय !
   कलयुग मारन जो चला , बैठा बुधि खोय !!

कलयुग का समय आते ही  कलयुग ने अपना रंग दिखाना सुरु कर दिया जब वो राजशाही वैश धारण कर हाथ में डंडा लिए , गाय - बैल के एक जोड़े को इस तरह पिटते हुए जा रहा था जैसे उनका कोई स्वामी ही नही हो।
उस समय पृथ्वी माँ ने गाय और धर्म ने बैल का रूप धारण कर रखा था।

धर्म रूपी बैल के तीन पैर ( त़प , पवित्रता , और दया ) ये तिन पैर टूट जाने से वह एक पैर पर ही चल रहे थे जिनका नाम था ( सत्य )


जब राजा परीक्षित ने देखा की राजशाही वैश धारण किये हुए काला कलूट एक दुष्ट व्यक्ति एक पैर पर चल रहे बैल और दुबली श्रीहीन गाय को पिटता ही जा रहा है , तब राजा परीक्षित ने अपना धनुस चढ़ा कर मेघ के सामान गभीर वाणी से उनको ललकार ते हुए बोले  अरे ! दुष्ट तू कौन है जो बलवान हो कर भी तू मेरे राज्य के इन दुर्बल निरपरद  प्राणियों को बलपूर्वक मारता ही जा रहा है ?
अरे ! पापी
तूने नट  की तरह वैष तो किसी राजा सा धारण कर  रखा है  पर कर्म से तू सूत्र  जान पड़ता है।

इस तरह गर्जना करते हुए जब राजा परीक्षित अपने  तीर कबान ले कर उनको मारने लगे तब कलयुग ने सोचा की अब मैं इस राजा के बाण से बच नही सकूँगा अब राजा मुझे मार ही डालेंगे , तब  कलयुग ने अपना राजशाही वेश झट पट उतर कर राजा परिक्षीत के चरणों में घिर पड़ा , बोल महाराज आप मुझे मारिये मत में कलयुग हूँ
मेरा काम है पाप ,कूट , कपट , चोरी , दरिद्रता , उत्पाद , अधर्म , फेलाना। ,आप जानते ही हो राजन बाकि तीनो युग अपना भोग - भोग कर चले गए है अब मेरी ही बारी है , विधाता की आज्ञा से मुझे आना पड़ा आप मुझे शमा कर दीजिये।

राजा परीक्षित पांडवों के पोत्र थे दया उनमे कूट कूट कर भरी हुयी थी। जब राजा  ने देखा की कलयुग हाथ जोड़कर विनम्र भावसे प्रार्थना करते हुए उनके चरणों में पड़ा है तो , राजा ने  कहा की जब तुम हाथ जोड़कर मेरी शरण में आ गया है अब तुझे कोई नही मार सकता पर तू अधर्म का सहायक है  इसलिए तु मेरे राज्य में नही रह सकता ,इस देश में भगवान श्री हरी यज्ञ के रूप में निवास करते है यहाँ तेरा निवास नही हो सकता।

कलयुग बोंला  महारज ! तीनो युगों के बाद मेरा ही समय है में जा नही सकता आप मुझे कोई स्थान  दे दीजिए।


तब राजा परीक्षित ने कलयुग को चार स्थान दिए थे ,
जो ( मधपान,  पर स्त्री गमन ,हिंसा , निर्दयता ,) पर कलयुग ने कहा महाराज ! यहाँ तो कोई परिवार नही बसते यहाँ तो कष्ट ही कष्ट है , आप एक स्थान मुझे और दे दीजिये जहा पूरा परिवार रहता हो , तब कलयुग ने एक स्थान  स्वर्ण  में मांग लिया   , राजा  ने कलयुग की बात मान कर कहा ठीक है ,अनीति से कमाए हुए स्वरण में तेरा ही निवास रहेगा
|

राजा ने कलयुग को पाँच स्थान ने दे दिए ( झूट , मद , काम ,वैर ,और रजोगुण ) ये पाँच स्थान दे कर राजा घर लोट आये।  ,

महाराज परीक्षित ने सोचा की आज मेरे पूर्वजो के खजाने खुलवाता हूँ देखू कितना क्या है , राजा  ने खजाने का ताला खुलवाया और उस में रखे हीरे मोती पन्ने से जड़े जेवरात को इधर उधर करते हुए उनकी नजर एक मुकुट पर पड़ी जो राजा ( जरासन ) का था जो अनीति से कमाए हुए स्वर्ण से बना हुआ था।

परीक्षित ने सोचा की आज में ये मुकुट ही पहन लेता हूँ , परीक्षित भूल गया की मेने ही अनीति से कमाए हुए स्वर्ण में कलयुग को वास दिया था।


राजा ने जैसे ही मुकुट अपने सिर पर धारण किया उनमे कलयुग बैठ गया , राजा घोड़े पर सवार हो कर सिकार खेलने निकले जहा उनको बहुत प्यास लगी थी , राजा ने देखा की सामने एक कुटिया है वह पानी पि आता हूँ , राजा बहार से ही उचे स्वर में आवाज लगाने लगा की अरे ,,,,, अन्दर कोई है ? जरा पानी पिला दो भाई !!
राजा ने सोचा की अन्दर से कोई जवाब नही आ रहा है तो वो भीतर चले गए जहा श्रंगी ऋषि अपने इष्ट देव के ध्यान में बेठे , राजा के सर पर काल नाच रहा था सो ऋषि को अनेको गलिय देते हुए की अरे मुर्ख में कब से आवाज लगाये  रहा हूँ सुनता नही मुरदा है क्या तू जनता नही में यहाँ का राजा हूँ। फिर भी ऋषि के तरफ से कोई जवाब न पा कर क्रोध में आ कर  ऋषि के गले में एक मृत साफ डाल कर चले गए

घर आकर  मुकुट को खोला  और सोचने लगा की अरे ये मेने क्या अपराद कर दिया जिन हाथो से ऋषि महात्माओ की सेवा किया करता था आज इन्ही हाथो से एक  ऋषि के गले में मृत साफ डाल कर आ गया , राजा पछतावे की आग में जल ही  रहा था , उतने में राजा के पास खबर आ गयी की जिन ऋषि के गले में आप ने मृतक साफ डाल कर आये है , उनके बेटे ने अप को श्राप दिया है की जिसने भी मेरे पिता श्री  के गले में मृत साफ डाला है उस की ठीक सातवे दिन तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु हो जायेगी।

फिर महाराज परीक्षित उसी समय घर छोड़ कर गंगा के किनारे चले गए जहा सुखदेवमुनि से पूरी भगवत कथा सुनी , जो आज हम को सुनने को मिल रही है..!!

                     { जय जय श्री राधे }  
              
                   ईस्वर अंस जिव अबिनासी !
                  चेतन अमल सहज सुख रासी !!


परमात्मा के अंस होने के कारण हम भी सुखराशी ( सुख का ढेर ) हैं , पर संसार को अपना मानने के कारण हम भी मुफ्तका  दुःख पा रहे हैं , इतने पर भी हम चेत नही सकते फिर अपने परमपिता को हम याद ही नही करते , भगवान के सिवाय हमारा कौन है जो सदा हमारे साथ रहे ? यमराज के सामने भी कह दो की मैं भगवान का हूँ , तो यमराज भी थार्रायेगा।

अगर हम भगवान के साथ सम्बन्ध स्वीकार कर ले तो हमारे में स्वाभाविक ही शुद्धि पवित्रता आ जायेगी। हम भगवान के है भगवान हमारे है , इतना कहने मात्र से हमारे में स्वतः पवित्रता आती है, हम भले ही कबुत हो पर हैं तो भगवान के ही हमे केवल अपनी कपुतायी मिटानी है।

कपुतायी हमारे में पीछे से आई है जन्म के पहले नही थी और देवी सम्पति पहले से ही थी। आसुरी सम्पति पैदा  होने के बाद आती है जैसे जो सच्च बोलने वाला है वह कितने ही रुपये देने पर भी झूट नही बोल सकता , पर झूट बोलने वाला थोड़े से रुपयों के लोभ से सच बोल देगा
 
सच बोलना हमारे स्वाभाव में सदा से है , पर झूट बोलने की आदत डाल ली इसलिए झूट बोलना सुगम दीखता है ,

पर झूट अपनी चीज नही है जो संसार है , और सच सदा से अपनी चीज है जो भगवान है और एक भगवान ही सदासे हमारे अपने है !!
                      { जय जय श्री राधे } 




    मुखसे लेय नाम हरिका , सो हरी भक्त कहलासी !
    ह्रदय नाम जपे , हरी वाक़े खुद ही भक्त बन जासी !!


विणा बजाते हुए नारदमुनि भगवान श्री राम के द्वार पर पहुचे।
नारायण नारायण !!

नारदजी ने  देखा की द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है
हनुमानजी ने पूछा नारद मुनि ! कहा जा रहे हो ?  बोले मैं प्रभु से मिलने आया हूँ नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है  बोले पता नहीं पर  कुछ बही खाते का काम कर रहे है ,प्रभु रजिस्टर में कुछ लिख रहे है , अच्छा क्या लिखा पढ़ी कर रहे है बोले मुझे पता नही  मुनिवर आप खुद ही देख आना

नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा की प्रभु कुछ लिख रहे है , नारद जी बोले प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है ?  ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए प्रभु बोले नही नारद मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है ये काम मैं किसी और को नही सोप सकता ,
अच्छा प्रभु  ऐसा क्या काम है ऐसा आप इस रजिस्टर में क्या लिख रहे हो ? बोले तुम क्या करोगे देख कर जाने दो , बोले नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस रजिस्टर में क्या लिखते है , बोले नारद इस रजिस्टर में उन भक्तो के नाम की लिस्ट है जो मुझे हर पल भजते है में उनकी नित्य हाजरी लगता हूँ


अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहा पर है ? नारदमुनि ने रजिस्टर खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था।  
नारद जी को गर्व हो गया की देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है पर नारद जी ने देखा की हनुमान जी का नाम उस रजिस्टर में कही नही है , नारद जी सोचने लगे की हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस रजिस्टर में क्यों नही है , क्या प्रभु उनको भूल गए है
नारद मुनि आये हनुमान जी  के पास
बोले हनुमान ! प्रभु के बही खाते  में उन  सब भक्तो के नाम है जो नित्य प्रभु को भजते है पर आप का नाम उस में कही नही है हनुमानजी ने कहा की मुनिवर,! होगा आप ने सायद ठीक से नही देखा होगा नारदजी बोले नही नही मेने ध्यान से देखा पर आप का नाम कही नही था , अच्छा कोई बात नही सायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस रजिस्टर में लिखा जाये , पर नारद जी प्रभु एक पॉकेट डायरी भी रखते है उस में भी वे नित्य कुछ लिखते है
  "अच्छा ?
 " हाँ !

नारदमुनि फिर गये प्रभु श्री राम के पास और बोले प्रभु ! सुना है की आप अपनी पॉकेट डायरी भी रखते है ! उसमे आप क्या लिखते है ? "बोले हाँ ! पर वो तुम्हारे काम की नही है , नारदजी ''प्रभु ! बताईये ना , मैं देखना चाहता हूँ की आप उसमे क्या लिखते है।
प्रभु मुस्कुराये और बोले मुनिवर मैं इन में उन भक्तो के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ , नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमे सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था , ये देख कर  नारदजी का अभिमान टूट गया
। 
 
कहने का तात्पर्य यह है की जो भगवान को सिर्फ जीवा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते है और जो ह्रदय से भजते है उन भक्तो के भक्त स्वयं भगवान होते है ऐसे भक्तो को प्रभु अपनी पर्शनल पॉकेट यानि अपने ह्रदय रूपी डायरी में रखते है
  जय जय श्री सीताराम ! 


   { जय जय श्री राधे }
   

इस धरती पर जब जब कंस जैसी  सन्तान पैदा होती है तो उनमे कही न कही उन माताओं का भी दोस होता है  ऐसा ही हुआ था जब कंस का अपनी माँ के गर्भ में प्रवेश हुआ था। 

वैसे तो राजा उग्रसेन की पत्नी सती सावत्री पतिव्रता थी पर एक दिन उनसे भी बड़ी भारी भूल हो गयी और कंश जैसी संतान को जन्म दे बैठी
 
एक दिन की बात है जब वे सुन्दर वस्त्र आभूषण पहन , सुन्दर श्रृंगार कर सज - धज कर अपनी सखियों के साथ एक वन में चली गयी , उस वन में एक राक्षस प्रवति का देत्या भी घूम रहा था उसकी द्रष्टि राजा उग्रसेन की पत्नी पर पड़ी , वो उस रानी के सुन्दर हाव भाव से बहुत आक्रसित हो रहा था वो देत्य न चाहते हुए भी उस रानी पर मोहित हो गया और उसके मन में छल कपट प्रवेश कर गया।
 

उस राक्षस ने अपने वेष को छोड़ कर राजाउग्रसेन का वेष धारण कर उस रानी के समीप जाने लगा , रानी के साथ सखियोने सोचा की राजाजी पधारे है हमे रानी और राजाजी को अकेले छोड़ देना चाहिए वे सखिया वहा से चली गयी। 
उस राक्षस ने सोचा की अच्छा मोका है उस कपटी ने राजा उग्रसेन का वैस धारण  किये हुए रानी के कन्दे पर हाथ धर कर धीरे धीरे उस रानी को एकांत में ले गया , कुछ क्षण बीत जाने पर , रानी उस राक्षस के हाव भाव से समज गयी की ये मेरे पति नही हो सकते ये कपटी कोई और ही है
 

रानी आक्रोश से भर कर तिलमिला ती हुई वाणी से बोली "अरे दुष्ट निर-लज कौन है तू जो छल से मेरे पति का वेष धारण कर मेरी पति व्रता का धर्म भ्रष्ट करने आया है ? अरे ओ _ निर-लज तू सीघ्र अपने वेष में आजा अन्यथा में तुझे श्राप देती हूँ , 

राक्षस झट अपने वेष में आ कर बोला की खबरदार जो मुझे श्राप दिया तो , दोस सिर्फ मेरा ही नही तुमारा भी है ऐसा सुन्दर श्रृंगार कर वन में विचरती हो ? क्या तुम नही जानती की राजघरानेकी स्त्रिया इस तरह बहार नही निकला करती ! और सुन ' तुमारे गर्भ में मेरी संतान ने प्रवेश कर लिया है उसके रस्य मैं तुमे बताता हूँ तुम उस गर्भ को नष्ट करने की कोसिस भी मत करना , वो बड़ा ही बलवान होगा पर इस से प्रजा को कष्ट भी बहुत होगा और तुम घबराना मत , हमारे इस पुत्र का वध करने के लिए स्वयं नारायण अवतरित होंगे हमारे इस पुत्र की मुक्ति स्वयं नारायण के हाथो होगी !
रानी ने सुना की इस बालक का वध करने के लिए स्वयं नारायण अवतरित होंगे वे इस बात से प्रसन्न भी हुई पर अपने पति व्रता धर्मो को खंडित होने का दुःख भी सताने लगा वे शर्म के मारे सर निचा किये अपने महल में चली गयी !!,,,,,,,,,,, { जय जय श्री राधे }

 

Monday, 18 November 2013



कुटिल वैश्या की कुटिलाई संत कबीर की कुटिया जलाई !
श्याम पिया के मन न भाई !!
 तूफानी गति देय हवाकी वैश्या के घर आग लगायी !
 श्याम पिया ने प्रीत निभाई !!


एक दिन संत कबीरदासजी की कुटिया के पास में आ कर एक वैश्या ने सुन्दर महल बना कर अपना कोटा जमा दिया !
कबीर जी का काम था सब दिन भगवान का नाम कीर्तन करना
पर वैश्या के यहाँ तो सारा दिन गंदा - गंदा संगीत सुनाई देता , एक दिन कबीरजी उस वैश्या के यहाँ गए और कहा , की देख बहन ! तुमारे यहाँ बहुत खराब लोग आते है यहाँ बहुत गंदे - गंदे शब्द  बोलते है और मेरे भजन में विक्शेप पड़ता है तो आप कही और जा के नही रह सकती है क्या ?

 संत की बात सुनकर वैश्या भड़क गयी और कहा की अरे फ़कीर तू मुझे यहाँ से भगाना चाहता है कही जाना है तो तु जा कर रह, पर मैं यहाँ से कही जाने वाली नही हूँ
कबीरजी ने कहा ठीक है जैसी तेरी मर्जी

कबीरदासजी अपनी कुटिया में  वापिस आ गए और फिर से अपने भजन कीर्तन में लग गये
जब कबीरजी के कानो में उस वैश्या के घुघरू की झंकार और कोठे पर आये लोगो के गंदे - गंदे शब्द सुनाई पड़ते तो कबीरजी अपने भजन कीर्तन की ध्वनी और भी ऊँचे स्वर मे करने लगते ,

 कबीरजी के भजन कीर्तन के मधुर स्वर सुनकर जो वैश्या के कोठे पर आने जाने वाले लोग थे वे सब धीरे धीरे कबीरजी के पास बैठ कर उनके भजन कीर्तन सुनने लग गए ,

 वैश्या ने देखा की ये फ़कीर तो जादूगर है इसने मेरा सारा धंधा चोपट कर दिया , अब तो वे सब लोग उस फ़कीर के साथ ही भजनों की महफ़िल जमाये बैठे है | वैश्या ने क्रोधित हो कर अपने यारो से कहा की तुम इस फ़कीर जादूगर की कुटिया जला दो ताकि ये यहाँ से चला जाये !

वैश्या के आदेश पर उनके यारों ने संत कबीर कि कुटियां में आग लगा दी ,
 कुटिया को जलती देख संत कबीरदास मुस्कुरः कर बोले  
  वहा ! मेरे मालिक अब तो तू भी यही चाहता है कि में ही यहाँ से चला जाऊं , प्रभु ! जब अब आपका आदेश है तो जाना ही पड़ेगा  , संत कबीर जाने ही वाले थे भगवान से नही देखा गया अपने भक्त का अपमान , उसी समय भगवान ने ऐसी तूफानी सी हवा चलायी उस कबीर जी कि कुटिया कि आग तो बुझ गयी और उस आग ने वैश्या के कोटे को पकड़ली वैश्या के देखते ही देखते उनका कोठा जलने लगा
 
वैश्या का कोठा धु धु कर जलने लगा वो चीखती चिल्लाती हुए कबीर जी के पास आ कर कहने लगी अरे कबीर जादूगर देख देख मेरा सुन्दर कोठा जल रहा है मेरे सुनदर पर्दे जल रहे है वे लहराते हुए झूमर टूट रहे है अरे जादूगर  तू कुछ करता क्यों नही !!  
कबीर जी को जब अपने झोपडी कि फिकर नही थी तो किसी के कोठे से उनको क्या लेना देना !
 

कबीर जी खड़े खड़े हंस ने लगे.  कबीर कि हंसी देख वैश्या क्रोधित हो कर बोली अरे देखो देखो यारों इस जादूगर ने मेरे कोठे में आग लगा दी अरे देख कबीर जिसमे तूने आग लगायी वो कोठा  मेने अपना तन , मन , और अपनी  इज्ज्त बेच कर बनाया और तूने मेरे जीवन भरकी कमाई पूंजी को नष्ट कर दिया !!
कबीरजी मुस्कुरा कर बोले कि देख बहन ! तू फिर से गलती कर रही है
ये आग न तूने लगायी न मेने लगायी !
ये तो अपने यारों ने अपनी यारी निभायी !!

तेरे यारो ने तेरी यारी निभायी तो मेरा भी तो यार बैठा है ! मेरा भी तो चाहने वाला है ! जब तेरे यार तेरी वफ़ा दारी कर सकते है तो क्या मेरा यार तेरे यारों से कमजोर है क्या ?

वैश्या समझ गयी कि 

मेरे यार खाख बराबर
कबीर के यार सिर ताज बराबर
उस वैश्या को बड़ी ग्लानि हुई कि मैं मंद बुद्धि  एक हरी भक्त का अपमान कर बैठी भगवान मुझे शमा करे !!

कबीरदासजी और वैश्या के तर्क से हमे यही समझने को मिलता है कि भगवान के भक्त कभी भगवान से शिकायत नही करते कैसी भी विपति आ जाये उसको भगवान का आदेस समझ कर स्वीकार करते है , और भगवान अपने भक्त का मान कभी घटने नही देते !
इसलिए भगवान कहते है कि
भक्त हमारे पग धरे तहा धरूँ मैं हाथ !
सदा संग फिरू डोलू कभी ना छोडू साथ !!

{ ज़ै श्री राधे }