Monday, 2 February 2015


श्री राधा कृष्ण के विवाह की कथा!

एक दिन नन्दबाबा ने सोचा की जब से लाला भयो है तब से गो चरावे नही गयो आज गो चरावे को जाता हूँ ,
बाबा , श्री बालकृष्ण लाल को गोदी में ले कर चल पड़े वे अपने लाला को लाड लडाते - लड़ाते गोए चरते हुए बहुत दूर निकल गए धीरे - धीरे भाण्डीर - वन जा पहुँचे

जहा थोड़ी ही देर में श्री कृष्ण की इच्छा से वायु का वेग अत्यंत प्रखर हो उठा ,
आकाश मेघों की घटा से आच्छादित हो गया तमाल और कदम्ब वक्षो के पल्ल्व टूट - टूट कर गिरने , उड़ने और अत्यंत डरावने उत्पादन करने लगे उस समय महान अन्धकार छा गया। नंदनंदन सामान्य बालक की भांति डर कर रोने लगे।

अपने लाला को डरते हुए रोते देख बाबा को भी भय लगने लगा तब वे शिशु को गोद मे लिए और उनको गर्गचार्यजी की कई हुई बात याद आई तब बाबा ने श्री राधा जी को याद किया,

उसी समय करोडो सूर्यो के समूह की सी दिव्य दिप्ति उदित हुई जो सम्पूर्ण दिशाओ में व्याप्त थी उस दिव्य प्रकाश में बाबा ने श्री राधाजी को देखा।

श्री राधाजी पहले ही सोलह शृंगार कर प्रकट हुई थी।

श्रीराधा जी के दिव्य तेज से अभिभूत हो बाबा ने तत्काल उनके सामने मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा-राधे ! ये साक्षात पुरषोतम है और तुम इनकी मुख्य प्रणवल्लभा हो , यह गुप्त रहस्य में गर्गजी के मुख से सुनकर जानता हूँ।

हे राधे ! अपने प्राणनाथ को मेरे अंक से ले लो ये बादलो की गर्जना से डर गये है इन्होने लीलावश यहाँ प्रकृति के गुणों को स्वीकार किया है इसिलए इनके विषय में इस प्रकार भय भीत होने की बात कही गयी है।

नन्दबाबा ने कहा की तुम अपने प्राणनाथ को मेरे अंग से ले लो और अपने घर जाओ।
बाबा के कहने का तात्पर्य यह था की तुम अपने प्रीतम को साथ ले कर (निकुंज) में जाओ क्यों की घर उसी को कहते है जहा ग्रहणी होती है , अब राधाजी ग्रहणी है तो जहा ( राधा कृष्ण ) होंगे वो राधा जी का घर हो ही गया। 

राधाजी ने अपने प्राणनाथ को बाबा से ले कर अपने अंग में भर लिया और श्रीकृष्ण राधाजी के छाती से एक शिशु की भांति चिपक गये , फिर जब , नन्दराय जी श्रीराधा जी को प्रणाम कर के चले गए तब श्रीराधा जी भी भाण्डीर वन में निकुंजकी लताओं में गयी।

वहा की भूमि अत्यंत सुशोभित थी क्योकि जहा (श्रीराधा कृष्ण का विवाह ) हो रहा हो वहाँ पर पृथ्वी नाच उठी और अपना दिव्य रूप प्रकट कर अपने आपको सजाने के लिए प्रकति को आदेश दे दिया


यमुना जी भी सुन्दर शृंगार कर वहां उपस्थित हो गयी , अन्य नदियाँ और सरोवर भी अपने सौंदर्य को प्रकट कर वह उपस्थित हुए , वहाँ की सजावट देखे कैसे ?क्यों की हमारी नजर ही नही टिकती वहाँ की सजावट जो प्रकृति ने की उसकी शोभा वर्ण करने का सामर्थ्य मुझमे नही है इसलिए उस अध्भुत दिव्य सुन्दर भूमि को मैं साष्टांग प्रणाम करती हूँ।

वहां की सुन्दर सोभा को देख श्री श्यामसुन्दर भी ललचा गए उस दिव्यधाम निकुंज की शोभाकला अवतरण होते ही अपने शिशु अवस्था को छोड़ साक्षात पुरषोतम घनश्याम भगवान श्री कृष्ण किशोरावस्था के अनुरूप दिव्य देह धारण कर श्री राधाजी के समुख खड़े हो गए।
उनके श्री अंगों पर पीताम्बर , हाथ मे बंशी , कानो में कुंडल , बाहो मे बाजूबंद , गले में.. , कंठ में सुन्दर आभूषण सोभा पा रहे थे , श्रीकृष्ण भी दुल्ल्हा सा ही रूप धारण कर प्रकट हुए थे।

उन्होंने हँसते हुए अपने प्रियतमा श्रीराधा जी का हाथ अपने हाथ में थाम लिया और उनके साथ ( विवाह - मंडप में प्रविष्ट हुए )

उस मंडप में विवाह की सब सामग्री संग्रह करके रखी गयी थी , मेखला , कुशा , सप्तमत्तिका और जल से भरे कलस आदि उस मंडप की शोभा बढ़ा रहे थे।

वहाँ एक श्रेष्ट सिंघासन प्रकट हुआ , जिस पर वे दोनों प्रिया प्रियतम एक - दूसरे से सट कर विराजित हो गए और अपनी दिव्य शोभा का प्रसार करने लगे
वे दोनों एक दूसरे से मीठी - मीठी बाते करते हुए मेघ और विदित की भांति पानी प्रभा से उद्दीप्त हो रहे थे , उसी समय देवताओ में श्रष्ट भगवान ब्रह्माजी आकाश से उतरकर भगवान श्री कृष्ण के सन्मुख आये और उन दोनों के चरणो मे प्रणाम करके हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे........!!

उसके बाद श्रीराधावल्लभ का विवाह श्री ब्रह्माजी ने विधिवत से सम्पन करवाया , सभी देवी देवताओ ने पुष्पो की वर्षा की


विवाह सम्पन होने के बाद सभी देवी देवता श्री राधा जी को प्रणाम कर के
  अपने अपने स्थान चले गए और प्रिया प्रियतम अपने ( निकुंज ) मे पधार गए , वह वे एक दूजे का शृंगार करने लगे पहले भगवान श्री कृष्ण ने अपनी प्रियतमा का अपने हाथो श्रंगार किया , सुन्दर वेणी बनायीं , कजरे लगाए  , नेत्रोमे कालज की पतली रेखा खीच दी तथा उत्तमोत्तम रत्तनो और फूलो से भी उनका श्रंगार किया राधाजी का पूर्ण शर्बगर् होने पर ,
जैसे ही श्रीराधा जी अपने प्रियतम का श्रंगार करने लगी उसी क्षण श्री कृष्ण अपने किशोरावस्था को त्याग कर छोटे से बालक बन गए , नंदबाबा ने जिस शिशुको जिस रूप में श्रीराधा जी के हाथ में दिया था उसी रूप में वे धरती पर लौटने लगे और भय से रोने लगे।

श्रीहरि को इस रूप में देख कर श्रीराधा जी तत्काल विलाप करने लगी और बोली हरे ! मुझपर माया क्यों फैलाते हो ? इस प्रकार विषादग्रस्त होकर रोती हुई श्रीराधा से सहसा आकाशवाणी ने कहा 
राधे ! इस समय सोच मत करो तुम्हारा मनोरथ कुछ काल के पश्चात पूर्ण होगा इतना कह कर आकाशवाणी भी चुप हो गयी श्री राधा जी अपने प्राणधन को ले कर नन्द बाबा के घर श्री यशोदा जी के हाथो सोप आई....!!
  { जय जय श्रीराधे } 


Saturday, 24 January 2015

श्रीसीता स्वयंवर

श्री सीता राम , लक्ष्मण उर्मिला , भरत जी मांडवी और शत्रुघ्न श्रुतकीर्ति  के शुभ विवाह का भजन ! 
  
आज मिथला नगरिया निहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!

माथे मणि मोरिया कुंडल सोहे कानवा !
कारें कारें कजरारे  जुल्मी   नयनवा
!!
लालचंदन सोहे इनके भाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!

सावर सावर गोरे गोरे जोड़ियां जवान है !
आंखियां देखलि सुनलिनी कान है
!!
जुग जुग जोड़ी जीवे बे मिसाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कामल सखियाँ !!

गगन  मगन आज मगन   धरतीयाँ !
देख देख दूल्हा जीके सावरी सुरतियाँ !!
बाल , वृद्ध , नर , नारी सब बेहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!

आज मिथला नगरिया निहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ!!

  { जय जय श्री राधे } 

Friday, 16 January 2015

               प्रभु श्रीराम की नरलीला !!
चम्पा - चमेली तुही बतादे ! 

सीता कहाँ पुकारे राम.... ?

रावण ने जब मायावी सीताजी का हरण किया उस समय भगवान श्रीराम नर लीला करते हुए साधारण मनुष्यो की भांति , विलाप करने लगे-) हा गुणों की खान जानकी! हा रूप, शील, व्रत और नियमों में पवित्र सीते... !
और वृक्षों की पंक्तियों से पूछते हुए चलते है ..
 
* हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
भावार्थ:- हे पक्षियों! हे पशुओं! हे भौंरों की पंक्तियों! तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरों का समूह, प्रवीण कोयल,॥

प्रभु श्रीराम बाकि रास्ते में तो लक्ष्मण जी को अच्छी - अच्छी कथाये सुनाते चलते है , की हे भरत ! तुम सावधान हो कर सुनो, जिसका मेरा गुण गाते समय शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ.. अनेको ज्ञानोपदेश देते है पर जैसे ही ऋषि मुनियो के आश्रम देखते है , वे पुरषोतम भगवान जोर - जोर से रोने लग जाते है। एक साधारण मनुष्य की भाति पत्नी के वियोगमे रुदन करने लगते है , उनके पीछे - पीछे चलते हुए लक्ष्मण जी को भी रोना पड़ता है , फिर जैसे कुछ दूर गए तो रोना बंद, और ज्ञानोपदेश शुरु।

लक्ष्मण जी ने सोचा की भैया बाकि रास्ते तो अनेको ज्ञानोपदेश देते चलते है पर जैसे ही ऋषियों के आश्रम देखते है ये साधारण मनुष्यो की भाति रोने क्यों लग जाते है ?

लक्ष्मण जी इस बात को समझ नही पाये पर भगवान उनके लिए रो रहे है जिनको अग्नि में सुरक्षित रख आये है।

यहाँ भगवान ने सीता मईया से कहा की ,
"सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥

अर्थात:- हे प्रिये! हे सुंदर पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा, इसलिए जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो।

जब सीता जी का हरण हुआ ही नही तो रुधन क्यों ? इसपर
भक्तो के भाव है की भगवान ऋषियों के आश्रम के आगे से साधारण मनुष्य की भाति पत्नी के वियोग में इसलिए रुधन करते हुए चल रहे है , मानो ये सिद्ध ऋषियों की पहचान करते हुए चल रहे हो।

कुछ ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य बने बैठे है ,
कुछ पत्नी के साथ रहते है ,
और कुछ ये सोच रहे है की पत्नी का होना तो जरुरी है ताकि समय पर भोजनादि मिलता रहे।

अब भगवान को पत्नी के वियोगमे रोते देख कुछ ऋषि बोले अरे भाई ! देखो - देखो ये राजा सम्राट दशरथ के पुत्र कौशल्यानंदन होते हुए भी अपनी
पत्नी के वियोग में रो रहे है फिर हमतो ठहरे साधारण मनुष्य कही हमारी पत्नी का भी कोई अपहरण न करले सो चौकन्ने हो जाओ। उनका चित भगवान से कुछ हठ कर स्त्रियों में लग गया , वे नाम के ऋषि मुनि रह गए।

कुछ ऋषि रामजी को देख कर ये सोचते थे की अरे भाई ! देखो स्त्री का होना कितना आवश्यक है , ये भगवान होते हुए भी इनको स्त्री की कितनी आवश्यकता है फिर हमतो
ठहरे मृत्युलोक के साधारण मनुष्य इसलिए हमे भी विवाह कर लेना चाहिए वे ऋषि मुनि अधकचरे ब्रह्मचर्य थे जिनका मन भोगविलास में रमणित हो रहा था।

कुछ ऋषियों ने सोचा की ये साक्षात परमब्रह्म परमात्मा होते हुए भी एक साधारण मनुष्य की भाति पत्नी के वियोग मे पड़े हुए है , मानो ये हमको संकेत दे रहे है की तुम ब्रह्मचर्य व्रत करते हुए भी पत्नी में आशक्ति रखते हो तो सोचलो तुम्हे भी मेरी तरह रोना पड़ेगा।

उस समय कहते है की जो ऋषि मुनि अपनी पत्नियों के साथ रह रहे थे उन सिद्ध ऋषियों ने अपनी पत्नियों को आश्रमसे बाहर निकाल दिया।

अब सोचने की बात है की भगवान ने ऐसा क्यों किया भगवान को ऐसा संकेत नही देना चाहिए।

हम साधारण मनुष्य के भीतर ऐसे ही सवाल उत्पन होंगे पर जो भगवतशरणागत हो गए जिन्होंने भगवान के नाम का सुहाग का चोला पहन रखा हो , जो संत पोशाक होती है , वे सोचते है हमको कुल्टा स्त्री नही बनना , हम भगवान की पतिव्रता नारी ही रहना चाहते है , क्योंकी भगवान जगतपति है , उस नाते ये जितने भी जीव है सब भगवान की स्त्रीया है , विश्व भरका दूल्हा तो एक ठाकुरजी ही है  ,

ऐसे महात्माओ के लिए भगवान को छोड़ कर और किसी की कोई आवश्यकता नहीं।

भगवान का भी अपने प्राण प्यारे भक्तो के प्रति ऐसा ही भाव होता है की जो निष्काम भाव से मुझे भजता है जो अकिंचन हो , जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो उन्हें मेरी प्राप्ति सहज ही हो जाती है , फिर वो मुझमे और मैं उनमे रमण करने लग जाते है , उस आत्मा में और मुझ परमात्मा में कोई अंतर नही रह जाता।

भगवन ओरु भगतन में अंतर निरंतर नाही !
भगवन  ही भगतनका रूपधरी आये है !!
भगवान और भक्तके प्रति ऐसे ही मेरे भाव है.. कुछ गलती हो तो क्षमा कीजियेगा ! 
 जय श्री राम !!

     { जय जय श्री राधे }

Monday, 10 November 2014

            हरी जन तो हारे भले जितण दो संसार !
            हारे हरिपुर  जावसी जीते यमके  द्वार !!


एक बार सब लंकावासी मिल कर रावण के पास गए और बोले महाराज ! आप तो रामजी के प्रबल विरोदी है और आप के भाई विभीषण जी तो रामजी के परम  भक्त है , वे सब  दिन राम नाम की रट लगाये रहते है और पुरे घरमे भी राम राम लिखा रखा है , और तो और हाथ में झोली माला ले कर  सब दिन राम राम करते रहते है और महाराज ! घरमे भी राम नाम का कीर्तन होता है ,
"श्री राम जय राम जय जय राम....
लंका वासियो ने रावण को खूब भड़का दिया।

रावण क्रोध से तिलमिला उठा और कहा विभीषण को बुलाओ ,
विभीषण जी आये और कहा ये लोग क्या कहते है तुम्हारे घरमे राम राम लिखा है
"बोले हाँ ! लिखा है
' बोले हाथमे झोली है , क्या जपते हो ?
"बोले ' राम राम..
विभीषणजी की बात सुन कर रावण तिलमिला कर बोला ,
' तुम मेरे शत्रु का नाम जपते हो ?
विभीषणजी "बिलकुल नही.....
विभीषण जी ठीक ही तो कह रहे थे रामजी किसीके शत्रु है ही नही , वे तो प्रत्येक जीव के हितैसी है।

रावण बोला फिर राम - राम क्यों जपते हो ?
विभीषणजी ने सोचा की सच कहूँगा तो ये दुष्ट  मेरे भजन में बाधा पहुचायेगा

विभीषणजी बोले " महाराज ! ये शिकायत करने वाले नाम के रहष्य को नही समझते , मैं तो मेरे भईया भाभी का नाम जपता हूँ पर , क्या कहे ! ये चुगलखोर नाम की महिमा नही समझ पाते , मैं अपने भईया भाभी का भक्त हूँ इसलिए राम नाम जपता हूँ।

रावण बोला राम राम जपने से तुम मेरा और तेरे भाभी का भक्त कैसे हुआ ?
"बोले महाराज ! आप त्रिलोकी के विजेता हो कर भी मंद्बुधियो की भांति बात करते है।
" आप का नाम रावण है की नही ?
' बोले हाँ ! है
" बोले भाभीका नाम मंदोदरी है की नही ?
' बोले हाँ ! है
अब आप भी ( राम नाम ) का रहस्य समझ लीजिये।
( रा माने रावण )
( म माने मंदोदरी ) आपका और भाभी का पूरा नाम लेनेमें कठिनाई होती है इसलिए संगसेप में ही ( राम नाम ) जप लेता हूँ।
रावण ने विभीषण जी को ह्रदय से लगा लिया और कहा की भाई हो तो विभीषण जैसा।
'प्रसन्न हो कर बोला , हाँ ! विभीषण इस भावसे तुम चाहे जितना राम राम करो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।

विभीषण जी झूट बोल रहे थे वे केवल राम भक्त है भईया भभीसे उनको क्या लेना देना पर रावण से पिंड छुड़ाने के लिए रावण को प्रसन्न करने वाली बात कही।
तात्पर्य यह है की कोई जीव भगवतशरणागत हो जाये और किसी भी तरह की बाधा आये तो उन बाधाओ को लाग कर किसी भी युक्ति से भगवत शरणागत हो जाना चाहिए , किसी भी युक्ति से केवल भगवान के हो जाओ !

जे   रति    होइ    सियाराम    सु !
सुमिरत रात दिवस तन, मन सु !!

  , एक ही ध्यान रहे , हम भगवान के है और एक भगवान ही हमारे अपने है।  { जय जय श्री राधे }

संत श्री कबीरदासजी के प्राकट्य की कथा
भक्ति बीज पलटे नही जो जुग जाये अनंत !
उच्च - नीच  कुल  उपजे   रहे  संतको  संत !!

एक सिद्ध महात्मा थे श्री रामानन्दचार्य जी उन्ही महात्मा का एक शिष्य था ब्राह्मण जो नित्य उनकी सेवा में उपस्थित रहता था।
 एक दिन उन ब्राह्मण को किसी आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ा उन ब्राह्मण ने श्री रामानन्दचार्य जी की सेवा में अपनी पुत्री को भेजा

 उस ब्राह्मण कन्या ने बड़े भावपूर्वक समस्त कार्य किया , जब घर जाने लगी तो श्रीस्वामीजी के श्रीचरण -कमलों में प्रणाम किया तो श्री स्वामीजी ने सहज भाव से आशीर्वाद दिया - पुत्रवती भव।
 यह सुनकर ब्राह्मण कन्या संकुचित हो गयी और हाथ -जोड़कर बोली , महाराज ! मैं तो अभी क्वांरी हूँ।  ब्राह्मण कन्या की बात सुन कर स्वामी श्री रामानंदचार्य भी किंचित विचार में पड़ गए।

इसी बीच श्री विष्णु भगवान का आदेश ले कर करुणामय भगवती श्री लक्ष्मी जी कलयुग के जीवो पर दया कर भू - लोक में पधारी उन्होंने विचार किया की कलयुग के लोगो का कल्याण तभी संभव है जब किसी समर्थ भक्त का अवतार हो।

इसी चिंता में विनिमग्न श्री लक्ष्मीजी घूमती - फिरती ( काशी में ) श्री रामानन्दचार्य जी के पास आई।

यहाँ आने पर देखा तो श्री स्वामीजी भी ब्राह्मण  कन्या को आशीर्वाद देकर विचारमग्न ही थे।
तब लक्ष्मीजी ने ब्राह्मण कन्या को एक तुलसीपत्र दिया और  स्वामीजी ने भी कुछ पुष्प प्रसादी दी। लक्ष्मीजी ने तुलसीपत्र देते हुए कहा की तुम स्वामीजी की पुष्प प्रसादी एवं ये तुलसीपत्र लो , और अपनी झोली में भर लो इससे श्रीस्वामीजी का वरदान भी व्यर्थ नही होगा और तुम्हारा कन्यात्व भी सुरक्षित रहेगा।

ब्राह्मण कन्या ने तुलसीपत्र और पुष्प प्रसादी अपने आँचल में ले ली, कुछ दूर चलने पर उसे वजनसा मालूम हुआ तो विचार की स्वामीजी ने ( वा लक्ष्मीजी ) ने तो  फूल ही दिया था फिर यह इतना भारी क्यों लग रहा है ? जब उसने देखा तब समझा की यह तो पुष्पो के स्थान पर एक परमदिव्य सुन्दर ( शिशु ) प्रकट हो गया है।

लोक - लज्जावश वह ब्राह्मण- कन्या उस शिशु को लहरतारा - तालाब के तट पर रखकर चली गयी। (1455 ज्येष्ठ पूर्णिमा सोमवार ) के दिन ही कबीरजी का प्राकट्य हुआ उस दिन दैवयोगवश नीरू - नीमा नाम के जुलाहा दम्पति उसी मार्ग से कही जा रहे थे।

नीमा को प्यास लगी थी वह जब लहरतारा में जल पिने गयी तो उसने , इस परम सुन्दर शिशु को कमल पत्रों पर खेलते देखा।

उसके हृदय में मातृत्व भाव जगा , वातसल्य उमड़ा , उसने शिशु को गोद में उठा लिया अब तक उसकी गोद भी पुत्र से खाली ही थी , उसने शिशु को लेकर नीरू  को दिखाया।  नीरू ने प्रथम तो आनाकानी की परन्तु बाद में पत्नी का अनुग्रह देखकर घर ले चलने की अनुमति दे दी , इस प्रकार श्री कबीरदासजी का पालन पोषण इन्ही नीरू - नीमा के हाथो  हुआ..| भक्तमाल ग्रन्थ में एक पद भी आता है
यथा वन्दौ श्रीप्रह्लाद जिन ,धार्यो रूप कबीर।
कलिमद  मर्दन वीरवर सिद्धि समर रणधीर।।

इस पद के अनुसार
भक्त शिरोमणि श्री प्रह्लादजी के अवतार कबीरदासजी ही है
    { जय जय श्री राधे }
 


Friday, 31 October 2014

गोपाष्टमी की गो पालक भारत वासियोको हार्दिक शुभ कामनाये 
बालकृष्ण लाल की गोचारण लीला के कुछ सब्द

भगवान वृन्दावन में बड़े - बड़े पहाड़ो और जंगलो में गौ चरण के लिए जाते थे पर मईया के बहुत कहने पर भी कभी जूती धारण नही की थी।

एक दिन मईया अपने लाला को गौ चरण के लिए श्रृंगार कर रही थी तब मईया ने अपने लाला को पद्म धारण करने के लिए फिर से आग्रह किया कि
"देख लाला ! तुमरे चरण बहुत कोमल है और तू गईया चरावे जावेगो तो तुमरे पैरो में कंकर , कंटक लग जायेंगे इसलिए व्यर्थ का हट छोड़ दे , हमारी बात मानले और पग में जूती धारण करले !

ठाकुरजी ने कहा अच्छा मईया ! जब तुम इतना आग्रह कर रही है तो ठीक है पर , मैं एक ही शर्त पर जूती धारण कर सकू हूँ , पहले हमारी जितनी भी गईया है उनसबके लिए जूती बनवालियो , जब हमारी गईया जूती पहनके चलेगी तब मैं भी जूती पहन लूंगा !

मईया हंस कर बोली हरे लाला ! तू बड़ो भोलो है गईया कभी जूती पहिने है ? गायतो पशु होवे है ,
ये सुन कर ठाकुरजी धरती पर उलट पुल्ट हो कर रोने लगे , सारा श्रृंगार बिगाड़ लिया , और बोले अरी मईया ! हमारी ( ईस्ट देव ) को तुमने पशु कैसे कह दिया ? गाय तो हम सबकी माता होवे है , फिर ( माँ ) पशु कैसे हो गयी ?

लाला का रुदन देख कर बाबा और मईया घबराएं कि अब लाला को कैसे मनावे , गाय को पशु कहने कि गलती हो गयी , तब मईया और बाबा ने कान पकड़े और बोले ,
अरे लाला ! हमसे बहुत भारी गलती हो गयी , हमको क्षमा करद्यो , आज के बाद गाय को कभी पशु नही कहेंगे , आज से गौ माता हम सबकी ईस्ट देव ही होगी..

मईया ने फिर से ठाकुरजी को जैसे तैसे मनाया और फिरसे गौ चरण के लिए राजी किया..

जरा विचार करे कि जब भगवान को ये सहन नही होता कि गाय को कोई पशु कहे , जब वो ही गौ धन कटनी में जाता है तब भगवान के कष्ट कि सीमा नही रह जाती..

गोविन्द चले आओ ,गोपाल चले आओ !
तेरी गईया तुझे पुकारे , संकट से बचा जाओ !!


        { जय जय श्री राधे }
   


Thursday, 16 October 2014

               सुदामाजी और संकोचिनाथ की कथा

ऐसो  बेहाल  बेवाइनसै माग  कंटक  जाल  गड़े  पुनि जोए।
हाय महादुःख पाये सखा ! तुम आये इतै न, कितै दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करी के  करूणानिधि  रोये।

पानी  परातको हाथ छुयौ  नहीं  नैननिके  जल ते  पग धोये।।
इसीको संकोचिनाथ कहते है !

आपसे धीरेसे- एकांत में सलाह की भांति एक बात कहूँ ?

श्रीनन्दबाबा का लाल बहुत संकोची है इस संकोचिनाथ से मांग कर इसे और अधिक संकोच में मत डालिये , आप कुछ माँगेगे , कुछ प्रार्थना करेंगे तो बड़ा संकोच बड़ा दुःख होगा इसे , इन्हे लगेगा की मैं इतना अयोग्य - इतना प्रमत्त, इतना कृपा - कृपाण हूँ की मेरे स्वजनोंको कहना पड़ता है- उनको प्रर्थना करनी पड़ती है।
इस आनंदकंद से प्रमाद नही होता -  यह अपने भक्तो के मंगल - विधान में लगा ही रहता , यह भी आप समझते है।

कोई एक बार इनके आगे सिर झुका देता है तो ये संकोच से गढ़ जाते है की मैं तो इनका कोई बड़ा हित नही कर पाया अब तो जितना बड़ा उसकी दृष्टि भी उतनी  बड़ी , अब हितभी उतनाही बड़ा होगा।
सुदामाजी तीन मुट्ठी चिउड़े ही तो भेट में ले गए थे वो भी संकोच के मारे श्रीकृष्ण को दे नही रहे थे , द्वारिका का वैभव देख कर सुदामाजी को साहस नही हुआ था की उस चिउड़े का उपहार द्वारिकाधीश को अर्पित करे , वे उस अपनी बगल में दबाये - सिकुड़े जा रहे थे , किन्तु श्रीयशोदानन्दन कही ऐसे मानने वालो मे से  है? ये तो अपनो से वस्तु छीन कर भी खा लेते है।
अब श्रीकृष्ण ने अपने मित्र से पूछ लिया - 'भाभीने मेरे लिए क्या उपहार भेजा है ?
सुदामाजी क्या कहते ? उन्होंने मस्तक झुका लिया 

उनका मस्तक झुका और श्रीकृष्ण का ( हाथ ) बढ़ा - 'यह आप बगलमे क्या दुबकाये है ? सुदामाजी ने और कसके दुबका दिया पोटली को , जिससे श्रीकृष्ण खीच ना पाये , पर श्रीकृष्ण के आगे कोई दबा सकेगा ? उनको कोई रोक सकेगा ? श्रीकृष्ण ने पोटली को खींचा इससे पोटली का वस्त्र फट गया चिउड़े निचे पादपीठ पर और भूमि पर बिखर गए 
श्रीकृष्ण ने कहा , ओह !  यह उपहार ! भेजा है भाभीने  ! श्रीकृष्ण भेटकी प्रशंन्सा करने लगे 'इतने उत्तम चिउड़े !
उस चिउडों को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई ( महीनो का अकालका मारा क्षुधातुर अन्नपर टूट पड़े ) उस आतुरतासे श्यामसुन्दर पर्यंक से भूमि पर
उत्तरा और उन चिउडों को समेटने लगे। पादपीठपर , भूमि पर - जहाँ
अपने ही नही सेवको तक के पैर पड़ते है , वहीँ गिरे - बिखरे चिउड़े (त्रिभुवन का स्वामी कंगाल ) के समान आतुरता से समेट रहा था और इनमे समेट लेने तक का धैर्य भी पूरा नही था।
एक मुट्ठी समेट कर अपने मुख में डाली और चबाते हुए बाकि चिउड़े बीनने लगा चिउड़े चबाते - चबाते कहने लगे , उ हा ! प्यारे मित्र ! ये परम स्वादिष्ट है !

भगवान सुदामाजी के चिउड़े चबा रहे थे उस समय पुरे विश्वरूप को ये तृप्त कर दे रहे थे ,
 आकाशमार्ग में खड़े देवता देख रहे है और अपने ओठो पर जीभ फेर रहे है जैसे ही भगवान ने चिउड़े चबाके भीतर निगले उसी क्षण देवताओंने तृप्त हो कर डकार ली और पेटपर हाथ फेरने लगे

अब आप इन मोहन का शिष्टाचार देखिये , वेदो में ये ही , वेदवाणी बन कर कहते है की चलते फिरते भोजन करना ( वर्जित ) है और यहाँ ये खुद शास्त्र की मर्यादा के विपरीत है ही ; किन्तु जब कोई अत्यंत आतुर हो जाये तो शिष्टाचार या मर्यादा का स्मरण कहा रहता है।

उसके बाद क्या हुआ आप सभी जानते ही है ! श्रीद्वारिकाधीश ने अपने मित्र को नविन वस्त्र पहनाये थे पर  , जब वे श्रीकृष्ण से विदा ले कर वापिस अपने घर जाने लगे तो , उस नटखट ने हंसकर कहा ,

अच्छा ! मित्र ! आप अपना अमूल्य उत्तरीय एवं धोती तो लेते ही जायँ , सुदामाजी ने सोचा ओहो ! इन श्रीकृष्ण को तो अपनी धोती और उतरिये का भी मोह है पर इस नटखट को सुदामाजी नही समझ पाये ,

द्वारिका के वस्त्र उतरवाने का भाव श्रीकृष्ण का यह था की यह वस्त्र मेरे ( अकिंचन ) भक्त के धारण किये हुए है इसलिए  इन्हे तो श्रीकृष्ण मस्तक पर लपेटेगा और प्राण के सामान सँभाल कर रखेगा क्यों की मित्रके धारण किए हुए वस्त्र जो है पर इनके कहने का ढंग तो देखिये , की अरे मित्र ! हमारे नविन वस्त्र उत्तार दो और अपने फ़टे पुराले वस्त्र लेते जाओ
 

सुदामाजी भी हंसकर बोले अरे ! हाँ ! कृष्ण मैं दरिद्र ब्राह्मण कहा इनको पहन कर अच्छा लगता हूँ !

 सुदामाजी अपनी मैली फटी धोती लपेटते हुए द्वारिका के वस्त्र उतारते- उतारते कहा ,
 चलना पैदल' मांगना भीख और ये कपडे ! कोई दो मुट्ठी अन्न देनेवाला भी होगा तो इन वस्त्रो को देख कर मुख मोड़ लेगा
अब सुदामाजी को कहा पता है की उस द्वारिकाधीश ने क्या दिया !


सुदामाजी ने कुछ नही माँगा पर उस संकोचिनाथ ने इतना दिया की वे कल्पना भी नही कर सकते इसलिए इस नटखट से कुछ मांग कर इन्हे संकोच में मत डालिये
 एक भक्त ने तो इनका नाम भी संकोचिनाथ रख लिया इसलिए ये संकोचिनाथ है।
              { जय
जय श्री राधे }