Tuesday, 5 February 2013
भोजराज जी मीरा बाई के चरणों में सर रखते हुए कहा की अब आप ही मेरी गुरु है..
मीरा बाई व् भोजराजजी के विवाह को चार महीने बीत गए । मीरा अपने नित्य कर्म में लग गयी , अपने गिरधर गोपाल की सेवा पूजा में लग गयी । एक दिन भोजराज जी मीरा के श्यामकुञ्ज में आये मसनदके सहारे गद्दी पर विराजे मीरा से पूछने लगे- " सुना है आप ने योग की शिक्षा भी ली है , ज्ञान और भक्ति आप के लिए दोनों ही सहज है । यदि थोड़ी बहुत शिक्षा सेवक को भी प्राप्त हो तो यह जीवन सफल हो जाय।"
मीरा भी थोड़ी सी दूर एक दूसरी गद्दी पर विराजी। भोजराजजी की तरफ देखते हुए बोली- "यह क्या फर्माते है आप ? प्रभु की कृपा से आप मिले है। कोई दूसरा होता तो अब तक मीरा के चिता की राख भी न रहती।"
भोजराजजी ने कहा आप जिनकी भक्ति करती है क्या आप ने कभी साक्षात् दर्शन किये है ?
यह प्रश्न सुनकर मीरा की आँखें भर आई और गला रुंद गया कुछ पल में अपने आप को संभाल कर बोली अब में आप से क्या छुपाऊ मन से तो वह रूप पलक झपकने जितने समय भी ओझल नही होता , किन्तु अक्षय तृतीय के प्रभात से पूर्व काल मुझे स्वपन आया की प्रभु बींद बन कर पधारे, देवता और द्वारिकावासी बारात में आये दोनों और चवर डुलायें जा रहे थे छत्र तना था उस रूप का क्या वर्नन करू...... मीरा ठकुजी के रूप का वर्णन करते करते कहने लगी उनके समान कुछ भी नही - कुछ भी नही,मीरा बोलते बोलते रुक गयी आखो से झर झर आसू बहने लगे गला रुद गया अपने सरीर की सुद्ध भूल गयी घुंघट हट गया , भोजराजजी ने दासी को बुलवाए और अपनी स्वामिनी की और संकेत किया उसने मुह धुलाया और जल पात्र मुखसे लगाया मीरा को चेतना प्राप्त हुई
मीरा बोली में क्या कह रही थी ? भोजराज बोले की आपने फ़रमाया की प्रभु अक्षय त्तियाको बींद बनकर पधारे थे ....
मीरा बोली हुकुम फिर ह्म्हारा हथलेवा हस्त मिलाप हुआ उनके पीताम्बर से मेरी साड़ी की गांठ बाँधी गयी फिर फेरे हुए फिर हमे महलो में पहुचाया गया में चरणों में झुकी और प्रभु ने बहो में भर लिया ,
मीरा फिर रो पड़ी मीरा के ढलते आसू लगा जैसे मोती की लडिया टूटकर झड रही हो ,भोजराज ने मीरा को गौर से देखा कही भी दिखावा नही , मीरा ने भोजराज की तरफ देख दृष्टि झूका ली , भोजराज ने फिर याद दिलाया ,आप कुछ फर्मा रही थी ? मीरा मुस्कुरा कर बोली हुकुम क्या अर्ज कर रही थी ? मेतो पागल हु ,आपको कोई अशोभ बात तो नही अर्ज कर रही थी
भोजराजजी बोले नही हुकुम आप ठाकुरजीसे विवाहकी बात फरमा रही थी , मीरा बोली आप के यहाँ से आया चुडला तो मेने पहना ही नही सब गहने वस्त्र ज्योके त्यों पड़े है मेने जो पहन रखा था वो सब द्वारका से आया हुआ पढला था , भोजराज असमझ से रह गये " क्या में द्वारिका से आया पढला व् यहाँ का पढला देख सकता हु ?
मीरा ने दासियों को हुकुम दिया की दोनों बक्शे इधर ले आओ और खोल कर दोनों सामग्री अलग अलग रखदो , भोजराज जी ने आश्चार्य से देखा सब कुछ एकसा , फिर भी चित्तोड़ के महाराणा का वैभ उनके सामने सुन्य था , भोजराज ने श्रध्दापूर्वक उन सब को छुआ ,और सब दासियों यथा स्थान रख कर चली गयी
भोजराज उठकर मीरा के चरणों में सीर धर दिया , मीरा ने चोक कर कहा अरे यह क्या कर रहे है आप ? और पांव छुराने का प्रयत्न किया , भोजराज जी ने कहा अब आप ही मेरी गुरु है मुझ मतिहिन को रास्ता सुझाकर प्रभु के चरणों में लगा दीजिये ,भोजराज जी का गला रुद गया नेत्रों से कई बुँदे निकल कर मीरा के अमल धवल चरणोंका अभिषेक कर उठे , मीरा का हाथ सहज ही उनके सीर पर चला गया , बोली उठिए! विराजिये!
प्रभू की महिमा अपार है। शरणागत की लाज उन्हीको है । फिर भोजराजजी ने अपने को सम्भाला । वे वापस गद्धी पर जा विराजे साफा के पल्लू से अपने आसू पोछे।
उसी दिन से भोजराजजी ने मीरा बाई को अपना गुरु बना लिया
भगवत कथा ही मनुष्य के मोक्ष का मार्ग है
भगवत कथा जिस का अर्थ है सिर्फ भगवान से सम्बन्धित बातें उन्ही की लीलाओं का ह्रदय से स्वागत, उनके गुण का वर्णन, मनुष्य की मुक्ति कैसे हो परमात्मा की प्राप्ति कैसे हो, संसारियों से मोह हटाकर उनके चरणों में प्रेम कैसे हो, उनके चरणों में चित्त लग जाये ।
भगवत कथा सुनकर भगवान के नाम में भी प्रीति हो जाये ।
जब नाम में ही प्रीति हो तो नामधारी से वंचित कैसे रह
सकते है। इसी को भगवत कथा कहते है ।
पर आज कल कुछ संतो ने अलग ही ढंग बना रखा है।
मैं किसी संतो की निंदा नही कर रही हूँ। जैसा देख रही हूँ वो ही बता रही हूँ ।
कथा वाचक भगवत कथा तो कम करते है और नेताओ की कथा ज्यादा होती है , ऐसा क्यों?
आधे से ज्यादा समय नेताओ के स्वागत में ही बिता देते है और जो भक्त भागवत कथा सुनने आते है वो उन कथा से वंचित रह जाते है। वहां भगवान का प्रचार नही नेताओ का परचार होता है।
जरा विचार कीजिये भगवान को किसी नेता या किसी व्यक्ति विशेष से क्या लेना-देना ,परमात्मा के लिए सब एक सामन है। उस भगवत कथा की आड् में जिन नेताओ को वी-आई-प़ी बना कर स्वागत किया जाता है वो सिर्फ होठों से होता है , दिलसे नही।
वहां तो सिर्फ भगवत प्रेमिओ का ही स्वागत होता है जो स्वयं भगवान करते है। वे नेता ये नही सोचते की यहाँ तो हमारा स्वागत किया जा रहा है, पर परलोक में हमारा क्या हाल होगा। जो हमारी वजह से कथा मे विलम्ब होता है, क्या वहां भी कहेंगे की आओ नेता जी। कौन नेता, कैसा नेता ? कौन मंत्री कैसा मंत्री ? ये पहचान वहां कोई काम नही आती।
वहां तो एक ही पहचान काम आती है, हरी भक्त, जो सत्य में भगवान का प्रेमी हो जिनका भगवान के पार्षदों के द्वारा स्वागत किया जाता है की आओ भक्तो आप का स्वागत है। कितना सुन्दर आसन लगायेंगे जरा कल्पना कीजिये....
भगवान के प्रेमी इस लोक में तो सुखी होता ही है, परलोक में भी सुखी हो जाता है ।
जहाँ तक मेरे विचार हैं की जो भगवत कथा करवाता है उनसे कथावाचक संत को साफ शब्दों में मना कर देना चहिये की भागवत कथा में कोई व्यक्ति विशेष नही होगा किसी को भी वी-आई-पि मान कर स्वागत नही होगा।
कोई विशेष स्थान नही होगा। कथा सुनने वाले सभी भक्तजन एक ही समान होंगे तब सही अर्थो में भगवत कथा होती है। जहाँ सिर्फ भागवत को ही माल्यार्पण किया जाये....
कोई कथा करवाने वाला पैसे की झड़ी लगा देता है तो लोगो में चर्चा होने लग जाती है की वहां क्या गजब की कथा करवाई। मैं आप सबसे पूछती हूँ की पैसे से गजब की कथा कैसे हो सकती है? क्या उन पेसो से भगवान का प्रेम खरीद कर वहां बैठे प्रत्येक व्यक्ति के मन में डाला जाता है ? अगर ऐसा नही होता तो फिर गजब की कैसे हुई ?
गजब की वो नही होती जिनमे नेताओ को वि -आइ पि बना कर स्वागत किया जाये उनके पद का प्रचार किया जाये , बल्कि गजब की वो होती है जिस मे कथा वाचक के मुख से निकले भगवान के गुण व् उनके स्वरुप सुनने से ही भगवान में प्रीति हो जाये उनके नाम का ऐसा रंग चढ़ जाए की फिर कभी उतरे ही नही । ऐसी लगन लग जाये की जहाँ नजर जाए, श्याम सुन्दर ही नजर आये।
।। जय श्री कृष्ण , श्री राधे ।।
Sunday, 3 February 2013
मीराबाई के विवाह की पिछली रात
उनका विवाह श्री श्याम सुन्दर के साथ...
अक्षय त्तियाका प्रभात प्रातः काल मीरा बाई पलंग पर सो कर उठी तो दासियाँ चकित रह गयी उन्होंने दौड़कर झाला जी को सुचना दी
उन्होंने आ कर देखा की मीरा विवाह के साजसे सजी है बहोमे चुड़ला पहना है जो विवाह के समय वर के यहाँ से वधु को पहनाया जाता है , नाक में नथ, सिरपर रखडी, शिरोभूषण, हाथो में रची मेहंदी , दाहिनी हथेली में हस्तमिलापका चिह्न , और साड़ीकी पटली में खोंसा हुआ पीताम्बर गठजोड़ा , चोटी में गुँथे फूल , और केशोंमे पिरोये गये मोती , कक्ष में और पलंग पर बिखरे फूल देख कर ,मीराबाई की माँ ने हडबडा कर पूछा "यह क्या मीरा बारात तो अब आएगी न ??
मीरा ने सिर निचा किये पांव के अंगूठे से धरा पर रेख खीच ते हुए कहा आप सबको ब्याहने की बहुत जल्दी थी न ?आज पिछली रातको मेरा विवाह हो गया
भाबू प्रभु ने कृपा कर मुझे अपना लिया मेरा हाथ थाम कर उन्होंने भवसागर से पार कर दिया... मीरा के आखोमें हर्ष के आंसू निकल पड़े ,
मीरा को गहनों व् श्रंगार से सजे देख माँ ने पूछा ये गहने तो अमुल्य है मीरा कहा से आये ? मीरा " पडला है भाबू ( बारात और वरके साथ वधु के लिए आनेवाली सामग्री को पडला या बरी कहा जाता है ये सब पडलेमें आये है ...
मीरा ने धीरे धीरे लजाते हुए कहा पोसागे मेवा और श्रृंगार सामग्री और भी है, वे इधर रखे है आप देख सम्हाल ले
श्याम सुन्दर के वहां से आये जेवर व् पोशाके देख मीरा बाई की माँ की आखे फेल गयी......! जरी के वस्त्रो पर हीरे जवारत का काम किया गया था जो अँधेरे में भी चमचमा रहे थे ,
वीरमदेवजी आये उन्होंने सब कुछ देखा और समझा मन में कहा ,
मीरा का विवाह करवा कर क्यों इसे दुःख दे रहे है हम .किन्तु अब तो घड़िया घट रही है कुछ भी बस में नही रहा ,वे निश्वास छोड़ कर बाहर चले गए
मीरा श्यामकुञ्ज में जा कर नित्य कर्म करने लग गयी, माँ ने आकर लाड लडाते हुए समझाया.... बेटी आज तो तेरा विवाह है चलकर सखियों व् भोजाइयो के बीच बैठ , यह भजन पूजा अब रहने दे
मीरा " भाबू सबको एक जैसा खेल अच्छा नही लगता आज यह पडला देखकर और मेरी हथेली का यह चिह्न देख कर भी आप को विश्वास नही हुआ,
भाबू बोली "विश्वास तो है बेटी पर तुजे मालूम है की तेरी तनिक सी ना कितना अनर्थ कर देगी इस मेड़ता में ? मीरा समझ गयी भाबू से बोली माँ आप चिंता न करिए जब भी कोई नेग करना हो बुला लीजियेगा मैं आ जाउंगी ,
"वाह मेरी लाडली तूने मेरी चिंता दूर कर दी ,
और भोजराजजी की बारात दरवाजे पर आ खड़ी हुए....
चितोड़ से आया हुआ पडला रनिवास में पंहुचा ,जब मीराको धारण करने का समय आया तो मीरा ने कहा भाबू सब वैसा का वैसा ही तो है ? इसे ही रहने दो....
फेरो की समय बायें हाथसे गिरधर गोपाल साथ ले लिया
मीरा ने मंडपमें अपने और भोजराजजी के बीचमें ठाकुर जी को विराज मान कर दिया जगह कम पड़ी तो भोजराज जी थोड़ा परे सरक गए......
भोजराजजी मीराबाई के अच्छे मित्र बने ना की पति
जय श्री कृष्ण
उनका विवाह श्री श्याम सुन्दर के साथ...
अक्षय त्तियाका प्रभात प्रातः काल मीरा बाई पलंग पर सो कर उठी तो दासियाँ चकित रह गयी उन्होंने दौड़कर झाला जी को सुचना दी
उन्होंने आ कर देखा की मीरा विवाह के साजसे सजी है बहोमे चुड़ला पहना है जो विवाह के समय वर के यहाँ से वधु को पहनाया जाता है , नाक में नथ, सिरपर रखडी, शिरोभूषण, हाथो में रची मेहंदी , दाहिनी हथेली में हस्तमिलापका चिह्न , और साड़ीकी पटली में खोंसा हुआ पीताम्बर गठजोड़ा , चोटी में गुँथे फूल , और केशोंमे पिरोये गये मोती , कक्ष में और पलंग पर बिखरे फूल देख कर ,मीराबाई की माँ ने हडबडा कर पूछा "यह क्या मीरा बारात तो अब आएगी न ??
मीरा ने सिर निचा किये पांव के अंगूठे से धरा पर रेख खीच ते हुए कहा आप सबको ब्याहने की बहुत जल्दी थी न ?आज पिछली रातको मेरा विवाह हो गया
भाबू प्रभु ने कृपा कर मुझे अपना लिया मेरा हाथ थाम कर उन्होंने भवसागर से पार कर दिया... मीरा के आखोमें हर्ष के आंसू निकल पड़े ,
मीरा को गहनों व् श्रंगार से सजे देख माँ ने पूछा ये गहने तो अमुल्य है मीरा कहा से आये ? मीरा " पडला है भाबू ( बारात और वरके साथ वधु के लिए आनेवाली सामग्री को पडला या बरी कहा जाता है ये सब पडलेमें आये है ...
मीरा ने धीरे धीरे लजाते हुए कहा पोसागे मेवा और श्रृंगार सामग्री और भी है, वे इधर रखे है आप देख सम्हाल ले
श्याम सुन्दर के वहां से आये जेवर व् पोशाके देख मीरा बाई की माँ की आखे फेल गयी......! जरी के वस्त्रो पर हीरे जवारत का काम किया गया था जो अँधेरे में भी चमचमा रहे थे ,
वीरमदेवजी आये उन्होंने सब कुछ देखा और समझा मन में कहा ,
मीरा का विवाह करवा कर क्यों इसे दुःख दे रहे है हम .किन्तु अब तो घड़िया घट रही है कुछ भी बस में नही रहा ,वे निश्वास छोड़ कर बाहर चले गए
मीरा श्यामकुञ्ज में जा कर नित्य कर्म करने लग गयी, माँ ने आकर लाड लडाते हुए समझाया.... बेटी आज तो तेरा विवाह है चलकर सखियों व् भोजाइयो के बीच बैठ , यह भजन पूजा अब रहने दे
मीरा " भाबू सबको एक जैसा खेल अच्छा नही लगता आज यह पडला देखकर और मेरी हथेली का यह चिह्न देख कर भी आप को विश्वास नही हुआ,
भाबू बोली "विश्वास तो है बेटी पर तुजे मालूम है की तेरी तनिक सी ना कितना अनर्थ कर देगी इस मेड़ता में ? मीरा समझ गयी भाबू से बोली माँ आप चिंता न करिए जब भी कोई नेग करना हो बुला लीजियेगा मैं आ जाउंगी ,
"वाह मेरी लाडली तूने मेरी चिंता दूर कर दी ,
और भोजराजजी की बारात दरवाजे पर आ खड़ी हुए....
चितोड़ से आया हुआ पडला रनिवास में पंहुचा ,जब मीराको धारण करने का समय आया तो मीरा ने कहा भाबू सब वैसा का वैसा ही तो है ? इसे ही रहने दो....
फेरो की समय बायें हाथसे गिरधर गोपाल साथ ले लिया
मीरा ने मंडपमें अपने और भोजराजजी के बीचमें ठाकुर जी को विराज मान कर दिया जगह कम पड़ी तो भोजराज जी थोड़ा परे सरक गए......
भोजराजजी मीराबाई के अच्छे मित्र बने ना की पति
जय श्री कृष्ण
Friday, 18 January 2013
स्वामी श्री राम सुखदासजी महाराज
भगवान ने मनुष्य की रचना न तो अपने सुखभोग के लिए की है , न उसको भोगो में लगाने के लिए की है और न उस पर शासन करने के लिए की है , प्रत्युत इसलिए की है की वह मेरे से प्रेम करे , मैं उनसे प्रेम करूँ ,वह मेरेको अपना कहे ,मैं उसको अपना कहूँ ,वह मेरे को देखे मैं उसको देखू.... !!
भगवान ने मनुष्य की रचना न तो अपने सुखभोग के लिए की है , न उसको भोगो में लगाने के लिए की है और न उस पर शासन करने के लिए की है , प्रत्युत इसलिए की है की वह मेरे से प्रेम करे , मैं उनसे प्रेम करूँ ,वह मेरेको अपना कहे ,मैं उसको अपना कहूँ ,वह मेरे को देखे मैं उसको देखू.... !!
Thursday, 17 January 2013
संत और गुरु क्या है और केसे होने चाहिए
{ जय श्री कृष्ण, श्री राधे }
एक जगह संत कथा कर रहे थे ,उसी समय एक व्यक्ति उठा और संत के गंजे सर पर ठोला मार कर चला गया,
और
वहा बेठे सभी भक्त जन सोच रहे थे की हम सभी तो गुरु जी को प्रणाम करते है
और ये केसा दुष्ट है जो गुरु जी के सर पर ठोला मार रहा है
सभी भक्तो को बड़ा ही क्रोध आया और कहा की
गुरुजी आप आज्ञा दे तो हम इस की पिटाई कर देते है , गुरु जी ने कहा क्यों ?
भक्तो ने कहा की इसने आप के सर पर ठोला मारने का अपराध जो किया है, गुरु
जी ने हँस कर संत वाणी से कहा की भैया आप 40 चालीस रूपया की एक मटकी लेते
हो तो उनपर ठोले मार कर बजा -बजा कर लेते हो की मटकी में कोई नुक्स तो नही
है, फिर ये तो मुझे अपना जीवन सोपने जा रहा है,जिसको जिवन
सोपने जा रहा हो वो वाकय में गुरु बनाने के लायक है या नही , येही सोच कर
मेरे सर को बजा रहा था .. जिस की सकारात्मक सोच है संत और गुरु उसीको कहते
है ,जो हर उलटी बात का सीधा मतलब निकाले, { जय श्री कृष्ण, श्री राधे }
Thursday, 10 January 2013
2013 का हार्दिक स्वागत करते हुए परमात्मा से प्रार्थना है की आप सब के लिए आने वाला नया साल खुशहाली भरा हो , खूब मोज मस्ती, हस्ते खेलते , आनंद के साथ बीते... लक्ष्मी मैया की कृपा हमेशा बनी रहे.......
आप सभी से एक नम्र निवेदन है की मनमे ऐसा भाव बना लीजिये की
संसार हमारे लिए क्या कहता है , यह जानने की इच्छा ना हो
किन्तु जगदीश्वर हमारे लिए क्या कहते है
इसका अवस्य ध्यान रहे....
अपने भीतर एक नारा लगा दीजिये की
प्रेम प्रभूसे, पसंद जगत की , नहीं चलेगी , नही चलेगी , नही चलेगी
प्रेम ही प्रभुसे ,पसंद ही प्रभुकी ,यही चलेगा ,यही चलेगा , यही चलेगा
जहा पति को आदर दिया जाता है वहा पत्नी भी आनंद से विराजमान रहती है ,जिस के ह्रदय में आदरसहित लक्ष्मीजी के पति नारायण विराजमान हो, ठाकुर जी विराजमान हो , वो भला कभी लक्ष्मीजी से वंचित केसे रह सकता है..
धन लक्ष्मी से तो हम सब प्रेम करते ही है ,पर लक्ष्मी जी के पति ठाकुर जी से भी प्रेम हो जाये ये मन दिन रात उन्हीका चिंतन करने लग जाये....
ये संसार हमारे भीतर उसी तरह रहे जिस तरह पानी के ऊपर तेल तेरता हो..... भीतर तो केवल परमात्मा ही हो.....
सीख बुरी लगे तो माफ़ कीजियेगा , आप सबतो पहले से ही बहुत समजदार है
जय श्री राधे
आप सभी से एक नम्र निवेदन है की मनमे ऐसा भाव बना लीजिये की
संसार हमारे लिए क्या कहता है , यह जानने की इच्छा ना हो
किन्तु जगदीश्वर हमारे लिए क्या कहते है
इसका अवस्य ध्यान रहे....
अपने भीतर एक नारा लगा दीजिये की
प्रेम प्रभूसे, पसंद जगत की , नहीं चलेगी , नही चलेगी , नही चलेगी
प्रेम ही प्रभुसे ,पसंद ही प्रभुकी ,यही चलेगा ,यही चलेगा , यही चलेगा
जहा पति को आदर दिया जाता है वहा पत्नी भी आनंद से विराजमान रहती है ,जिस के ह्रदय में आदरसहित लक्ष्मीजी के पति नारायण विराजमान हो, ठाकुर जी विराजमान हो , वो भला कभी लक्ष्मीजी से वंचित केसे रह सकता है..
धन लक्ष्मी से तो हम सब प्रेम करते ही है ,पर लक्ष्मी जी के पति ठाकुर जी से भी प्रेम हो जाये ये मन दिन रात उन्हीका चिंतन करने लग जाये....
ये संसार हमारे भीतर उसी तरह रहे जिस तरह पानी के ऊपर तेल तेरता हो..... भीतर तो केवल परमात्मा ही हो.....
सीख बुरी लगे तो माफ़ कीजियेगा , आप सबतो पहले से ही बहुत समजदार है
जय श्री राधे
Sunday, 6 January 2013
मीराबाई की जुबानी कल्पना
मीरा यमुना किनारे जल लेकर लौट रही है धीरे-धीरे भाव जगत में खो गयी ,उनके नेत्र इधर उधर निहार कर अपना धन खोज रही है । निराशा ,आशा उनके पद उठने नही देती । निराशा कहती है की "अब नही आयेंगे वो , चल घर चल " और आशा कहती है की "यही कही होंगे अभी आ जायेंगे , नैन मन ठंडे करले ।"
मीरा सोच रही की घर जाने पर संध्या पूर्व दर्शन -लाभ की आशा नहीं! इसी भाव से दो पद शीघ्र और चार पद धीमे चलती जा रही थी की किसी ने उसके सर से कलशी उठा ली। उसने अचकचाकर उपर देखा तो एक कदम्ब पर एक हाथ से दाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाए मनमोहन बेठे हंस रहे हैं हीरक दन्त प्रवाल अधरों की आभा पा तनिक रक्ताम्भ हो उठे है और अधरों पर दन्त पंक्ति की उज्ज्वलता झलक रही है। नेत्रों में अचगरि जैसे मूरत हो गयी।
लाज के मारे उसकी द्रष्टि ठहरती नही, लजा निचे और प्रेम-उत्सुकता उपर देखने को विवश कर रही है ।
कलशी से ढले पानी से वस्त्र और सर्वांग आर्द्र हैं। "कलशी दे दो" यह कहते हुए भी नहीं बन पा रहा है।
वे एकदम वृक्ष से उसके समुख कूद पड़े वह चोंक कर चीख पड़ी साथ ही उन्हें देख कर लजा गयी, उसके गाल कर्ण लाल हो गए।
श्री कृष्ण बोले -" डर गयी न ?"
उन्होंने हंस कर पूछा और हाथ पकड कर कहा " चल आ थोड़ी देर बैठ कर बातें करे।"
वृक्ष ताल की एक शिला पर दोनों बैठ गए।
श्याम सुन्दर बोले - " क्या लगा तुझे कोई वानर अथवा भल्लुक कूद पड़ा है न।
श्याम ने उनकी मुखडी थोड़ी ऊँची करते हुए पूछा - " मैं क्या करूँ । बोलेगी नहीं तो मैं और सताउंगो। तेरी यह मटुकिया हे न याको फोड़ देउंगो और .........और ........का करुंगो?" उन्होंने सोचते हुए एक दम से कहा - "-- तेरी नाक खीच दुंगो और......."
श्याम की ऐसी बातो पर मीरा को हसीं आ गयी , और वे भी हसने लगे,
मीरा से पूछा - " अभी क्या पानी भरने का समय है? दोपहर में घाट नितांत सुने रहते है , जो कहूँ सचमुच भल्लुक आ गयो तो .....? "
मीरा बोली - " तुम हो न"
श्याम ने कहा - मैं क्या यहाँ बैठा ही रहूँगा? गोए नहीं चरानी मुझे ?"
मीरा ने सर झुकाते हुए कहा - " एक बात कहूँ?"
श्याम बोले - " एक नहीं सॊ कह। पर सर तो उचा कर । तेरो मुख ही नहीं दिखे रहो मोहे ।"
मीरा ने मुख ऊँचा किया और फिर से लाज ने आ घेरा।
श्याम ने कहा - " अच्छा ! अच्छा ! मुख निचे ही रहने दे ,कह क्या बात है?" मीरा ने बहुत कठिनाई से बोंला- " तुम्हे कैसे प्रसन्न किया जा सकता है? " कृष्ण ने कहा - " तो सखी मैं तुम्हे अप्रसन्न दिखाई दे रहा हूँ ? "
श्याम - " पर मेने तेरी मटकिया ले ली तो कौन्सो गंगा स्नान कराय दियो ,
यही ? "
मीरा "यह नही..........!
कृष्ण - "फिर कहा भयो ? तेरो घडो फोड़ दुंगो यही ? "
मीरा - " नाय !"
कृष्णा - "तो फिर तू बतावे क्यों नाय ? कबकी यह नाय वह नाय किया जा रही है ?"
मीरा ने शर्माते हुए कहा - " सुना है तुम प्रेम से वस होते हो ?"
कृष्ण - "मोकु वश करके का करेगी सखी ! नाथ डालोगी के पैर बंदोगी ?
मेरे वश हुए बिना तेरो के काज अटक्यो है भला ?"
मीरा - " वो नाय "
कृष्ण - "बाबा रे बाबा ! तो से तो भगवान ही हार जायं "
श्याम सुन्दर कहने लगे - " कासे पूछ रयो हूँ? पुरो मुख ही नाय खुले । बात पूरी नाय कहोगी तो में भोरो , भारो कैसे समझुंगो?"
मीरा ने आँख मूँदकर पूरा जोर लगाकर कहा दिया - " की सुनो श्याम सुन्दर ! मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए । "
कृष्ण ने अनजान हो कर पूछा - " सो कहा होय सखी ?"
मीरा की विश्वता पर अपनी आखों में आँसू भर आये ,घुटनों में सिर दे कर रो पड़ी ।
श्याम सुन्दर बोले - " रोवै मत ना "
ये कहते हुए अपनी बहो मे भर मीरा के सिरपर अपना कपोल रखते हुए कहा - " और अनुराग कैसो होवे री ..........? "
श्याम सुंदर ने कहा - " अब तुम्हारे सुख की इच्छा क्या है ? अब तू मोको दुःख दे रही हो"
वे हंस कर दूर जा खड़े हुए ,मीरा ने आचार्य से देखा।
" ऐ.... ? ले अपनी कलशी बावरी कहिकी "
ये कहते हुए कलशी मीरा के सर पर रख कर वनकी और दोड़ गए , और मीरा ठगी सी बैठ रही !!!
जय श्री कृष्ण ........
मीरा यमुना किनारे जल लेकर लौट रही है धीरे-धीरे भाव जगत में खो गयी ,उनके नेत्र इधर उधर निहार कर अपना धन खोज रही है । निराशा ,आशा उनके पद उठने नही देती । निराशा कहती है की "अब नही आयेंगे वो , चल घर चल " और आशा कहती है की "यही कही होंगे अभी आ जायेंगे , नैन मन ठंडे करले ।"
मीरा सोच रही की घर जाने पर संध्या पूर्व दर्शन -लाभ की आशा नहीं! इसी भाव से दो पद शीघ्र और चार पद धीमे चलती जा रही थी की किसी ने उसके सर से कलशी उठा ली। उसने अचकचाकर उपर देखा तो एक कदम्ब पर एक हाथ से दाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाए मनमोहन बेठे हंस रहे हैं हीरक दन्त प्रवाल अधरों की आभा पा तनिक रक्ताम्भ हो उठे है और अधरों पर दन्त पंक्ति की उज्ज्वलता झलक रही है। नेत्रों में अचगरि जैसे मूरत हो गयी।
लाज के मारे उसकी द्रष्टि ठहरती नही, लजा निचे और प्रेम-उत्सुकता उपर देखने को विवश कर रही है ।
कलशी से ढले पानी से वस्त्र और सर्वांग आर्द्र हैं। "कलशी दे दो" यह कहते हुए भी नहीं बन पा रहा है।
वे एकदम वृक्ष से उसके समुख कूद पड़े वह चोंक कर चीख पड़ी साथ ही उन्हें देख कर लजा गयी, उसके गाल कर्ण लाल हो गए।
श्री कृष्ण बोले -" डर गयी न ?"
उन्होंने हंस कर पूछा और हाथ पकड कर कहा " चल आ थोड़ी देर बैठ कर बातें करे।"
वृक्ष ताल की एक शिला पर दोनों बैठ गए।
श्याम सुन्दर बोले - " क्या लगा तुझे कोई वानर अथवा भल्लुक कूद पड़ा है न।
श्याम ने उनकी मुखडी थोड़ी ऊँची करते हुए पूछा - " मैं क्या करूँ । बोलेगी नहीं तो मैं और सताउंगो। तेरी यह मटुकिया हे न याको फोड़ देउंगो और .........और ........का करुंगो?" उन्होंने सोचते हुए एक दम से कहा - "-- तेरी नाक खीच दुंगो और......."
श्याम की ऐसी बातो पर मीरा को हसीं आ गयी , और वे भी हसने लगे,
मीरा से पूछा - " अभी क्या पानी भरने का समय है? दोपहर में घाट नितांत सुने रहते है , जो कहूँ सचमुच भल्लुक आ गयो तो .....? "
मीरा बोली - " तुम हो न"
श्याम ने कहा - मैं क्या यहाँ बैठा ही रहूँगा? गोए नहीं चरानी मुझे ?"
मीरा ने सर झुकाते हुए कहा - " एक बात कहूँ?"
श्याम बोले - " एक नहीं सॊ कह। पर सर तो उचा कर । तेरो मुख ही नहीं दिखे रहो मोहे ।"
मीरा ने मुख ऊँचा किया और फिर से लाज ने आ घेरा।
श्याम ने कहा - " अच्छा ! अच्छा ! मुख निचे ही रहने दे ,कह क्या बात है?" मीरा ने बहुत कठिनाई से बोंला- " तुम्हे कैसे प्रसन्न किया जा सकता है? " कृष्ण ने कहा - " तो सखी मैं तुम्हे अप्रसन्न दिखाई दे रहा हूँ ? "
श्याम - " पर मेने तेरी मटकिया ले ली तो कौन्सो गंगा स्नान कराय दियो ,
यही ? "
मीरा "यह नही..........!
कृष्ण - "फिर कहा भयो ? तेरो घडो फोड़ दुंगो यही ? "
मीरा - " नाय !"
कृष्णा - "तो फिर तू बतावे क्यों नाय ? कबकी यह नाय वह नाय किया जा रही है ?"
मीरा ने शर्माते हुए कहा - " सुना है तुम प्रेम से वस होते हो ?"
कृष्ण - "मोकु वश करके का करेगी सखी ! नाथ डालोगी के पैर बंदोगी ?
मेरे वश हुए बिना तेरो के काज अटक्यो है भला ?"
मीरा - " वो नाय "
कृष्ण - "बाबा रे बाबा ! तो से तो भगवान ही हार जायं "
श्याम सुन्दर कहने लगे - " कासे पूछ रयो हूँ? पुरो मुख ही नाय खुले । बात पूरी नाय कहोगी तो में भोरो , भारो कैसे समझुंगो?"
मीरा ने आँख मूँदकर पूरा जोर लगाकर कहा दिया - " की सुनो श्याम सुन्दर ! मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए । "
कृष्ण ने अनजान हो कर पूछा - " सो कहा होय सखी ?"
मीरा की विश्वता पर अपनी आखों में आँसू भर आये ,घुटनों में सिर दे कर रो पड़ी ।
श्याम सुन्दर बोले - " रोवै मत ना "
ये कहते हुए अपनी बहो मे भर मीरा के सिरपर अपना कपोल रखते हुए कहा - " और अनुराग कैसो होवे री ..........? "
श्याम सुंदर ने कहा - " अब तुम्हारे सुख की इच्छा क्या है ? अब तू मोको दुःख दे रही हो"
वे हंस कर दूर जा खड़े हुए ,मीरा ने आचार्य से देखा।
" ऐ.... ? ले अपनी कलशी बावरी कहिकी "
ये कहते हुए कलशी मीरा के सर पर रख कर वनकी और दोड़ गए , और मीरा ठगी सी बैठ रही !!!
जय श्री कृष्ण ........
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