राम नवमी की सभी भक्तो को हार्दिक शुभ कामनाये
देखो आये है रघुवर जी सब मिल स्वागत करो !
गावो मंगल बधाई प्यारी सब मिल दर्शन करो !
अयोध्या के महाराज दसरथ जिनके राज्य में कोई संतान न थी , राजा दसरथ गुरु जी के पास गए और बोले गुरु जी मेरी कोई संतान नहीं है मेरे राज्य का उतराधिकारी कोई नहीं है , आप कृपा कर मुझे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दीजिये तब गुरु ने कहा , राजन तुम चिंता न करो तुमतो मेरे पास एक पुत्र के लिए आये हो पर मैं तुम्हे एक नही चार पुत्रो का आशीर्वाद देता हु तुम्हे चार पुत्रो की प्राप्ति होगी , और संगी ऋषि को बुला कर पुत्र प्राप्ति का यग्य करवाया यग्य भगवान पधारे खीर का प्रशाद दिया , तीनो रानिय ने खीर का प्रसाद लिया और तीनो रानियों गर्व वती हुए
फिर वो शुभ घडी आ ही गयी चेत्र मास शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित् मुहूर्त था। दोपहर का समय था। न बहुत सर्दी थी, न धूप (गरमी) थी। वह पवित्र समय सब लोकों को शांति देने वाला था शीतल, मंद और सुगंधित पवन बह रहा था। देवता हर्षित थे और संतों के मन में बड़ा चाव था। वन फूले हुए थे, पर्वतों के समूह मणियों से जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृत की धारा बहा रही थीं भगवान श्री राम चत्र भुज रूप में प्रकट हुए कौसल्या माँ को बोले माँ में तुहारा पुत्र ! माँ कौसल्या बोली ये पुत्र का नही ये तो पिता का रूप है पुत्र कोई लम्बे चौड़े होते है क्या ? चार हाथवाले थोड़े ही होते है ? हे भगवान मैं आप को गोदीमे ले सकू ऐसे सिसु बन जाईये मेरी ये इच्छा पूरी करो प्रभु , माँ स्तुति करने लगी
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा |
कीजे सिसुलीला अति प्रियसिला यह सुख परम अनूपा |
सुनी वचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा |
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा |
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार
सिया वर राम चन्द्र की जय ।
दीनों पर दया करने वाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरने वाले उनके अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर गई। नेत्रों को आनंद देने वाला मेघ के समान श्याम शरीर था, चारों भुजाओं में अपने (खास) आयुध (धारण किए हुए) थे, (दिव्य) आभूषण और वनमाला पहने थे, बड़े-बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभा के समुद्र तथा खर राक्षस को मारने वाले भगवान प्रकट हुए
दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी- हे अनंत! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ। वेद और पुराण तुम को माया, गुण और ज्ञान से परे और परिमाण रहित बतलाते हैं। श्रुतियाँ और संतजन दया और सुख का समुद्र, सब गुणों का धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तों पर प्रेम करने वाले लक्ष्मीपति भगवान मेरे कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं
भगवान श्री राम बाल सिसु बनगए माँ कोशल्या हर्षित हो कर अपने लालन को लाढ लड़ाने लगी..
मईया ले लाढ लडाय नजर नही लग जावे
मुख में छोटी छोटी दूध सी दतियाँ !
लेत अछंग लगाय लियो छतियाँ !
कजरा बिंदु लगाय नजर नहीं लग जावे !
क्या जानू क्या पुन्य प्रघट भयो !
नारायण गयो आय नजर नही लग जावे !
{ जय श्री राम जय जय श्री सीताराम }
Friday, 19 April 2013
Thursday, 28 March 2013
Tuesday, 26 March 2013
व्रज में रतन राधिका गोरी ,
राधे खेले श्याम संग होरी
व्रज में रतन राधिका गोरी ,
बाह पकड़ के कलयिया मरोड़ी
भर पीछकरी मोरे अंग पे छोड़े
हो नटखट रंग दिनी मोरी चोली
व्रज में रतन राधिका गोरी
अबीर गुलालके बादल छाये
होरी है, होरी है ,शोर मचाये
हो सखिया खेर मोहे झक झोरी
व्रज में रतन राधिका गोरी
राधे खेले श्याम संग होरी
व्रज में रतन राधिका गोरी.....
{ जय जय श्री राधे }
प्रभु जिसको तारे
कौन उसको मारे
प्रह्लाद जी की भक्ति देख हिरण्यकशिप ने सोचा की ये मेरा बेटा हो कर शांत कैसे है , मेरा बेटा तो जन्मजात से ही उत्पाती होना चाहिए , ये कैसे शान्ति से रहता है ये कैसे भजन कर रहा है.. इसे मुझे देत्य कुलके हिसाब से बनाना पड़ेगा
और संडाम्रगऋषि के पास विद्द्या अद्ययन करने भेज दिया , जो संडाम्रगऋषि के यहाँ एक ही शिक्षा दी जाती थी मारना कैसे ,पीटना कैसे , लूटना कैसे , भिड़ना कैसे , लेकिन प्रह्लाद जी तो जरा भी ध्यान नहीं देते ,
एक दिन प्रह्लाद जी को हिरण्यकशिप अपनी गोदी में बिठा कर पूछा बेटा क्या शिक्षा पाई ? , प्रह्लाद जी बोले पिता जी , ( श्रवणंम , कीर्तनम , विश्नो ,स्मरणम , पादसेवनम , अर्चनम वंदनम ,दाश्यम , सख्यम , आत्म निवेदम...),
ये नवदा भक्ति है ! पिता जी इन नों भक्ति में से एक भी भक्ति भगवान के चरणों में हो जाये तो जिव का कल्याण हो जाये ! हिरण्यकशिप क्रोधित हो कर बोले "रे मुर्ख तुझे पता है ना ! मुझे भगवान बिलकुल प्रिय नहीं लगते फिर तू क्यों मेरे सामने भगवान का नाम लेता है ? तू जिस नारायण का नाम लेता है वो मेरा सबसे बड़ा सत्रु है , और तुम मेरे पुत्र हो कर मेरे सत्रु का नाम लेता है..
प्रह्लाद जी को फिर से वही संडाम्रगऋषि के यहाँ भेज दिया जहा , मारना ,पीटना , लूटना, भिड़ना इस प्रकारकी शिक्षा दी जाती थी
एक दिन संजोग ऐसा बना की गुरु जी किसी काम से बाहर गए , प्रह्लाद जी ने सब शिष्यों को इकट्टा किया , और सब को कहा सुनो भाई अपनको जन्म देत्य कुल में मिला इसका अभिप्राय ये थोड़ी की अपन भी खोटा खोटा काम करे अपन भी तो भगवान का भजन करके भगवान को पा सकते है ! उन देत्य बालको ने कहा भाई हमको तो भगवान का भजन करना आता नही , कैसे भगवान का भजन करते है ? तू बड़ी अच्छी अच्छी बाते करता है तुही हमे सिखादे ? प्रह्लाद जी बोले जैसे में कीर्तन करू वैसे तुम भी कीर्तन करो,
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो..
संडाम्रग आये बालको को कीर्तन करते देखा , की ये क्या पहले तो एक ही बालक भारी पड़ता था अब तो सब बालक बिगड़ गए ,
संडाम्रगऋषि गए , हिरण्यकशिप के पास बोले " महाराज पहले तो आप का एक बालक ही बिगड़ा हुआ था , अबतो सब बालक बिगड़ गये , हिरण्यकशिप ने अपने सेनिक को भेजा की जाओ उसे पकड़ कर मेरे पास ले आओ , पर जो भी सेनिक जाते, वहाँ सब बालको को कीर्तन करते हुए देखते , और सोचने लगते की राजा की नोकरी खूब करी पर ऐसा सुख ऐसा आनन्द कभी नही देखा , जो होगा सो देखा जायेगा । अपने तीर ,कमान ,भाले ,तलवार , रख देते एक कोने में और सब बाल को के पीछे कीर्तन करने बैठ जाते ।
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो..
संडाम्रगऋषि फिर आये बोले महाराज पहले तो आप का एक बालक ही बिगड़ा हुआ था, फिर सब विद्यार्थी बिगड़े , अब तो आप की पूरी सेना भी बिगड़ गयी सब आपके सत्रु के कीर्तन में लग गये , हिरण्यकशिप ने सोचा ये छोरा ऐसे नही मानेगा , सारा दिन मेरे सत्रु नारायण का नाम लेता है ।
हिरण्यकशिप ने पहलादजी को मारने का आदेश दे दिया।,
होलिका नाम की एक राक्षसी थी जिस के पास चादर थी , उसने कहा की मैं इस चादर को ओढ़ कर बैठ जाऊ और कोई मुझे आग लगादे तो में बच जाउंगी और मैरि गोदीमे बेठेगा वो जल जायेगा , और पहलाद जी को होलिका की गोदीमे बिठा कर आग लगादी
अचानक हवा ऐसी जोर की चली , वो चादर हवामे उड़ कर प्रह्लाद जी पर गिर गयी प्रह्लाद जी बच गए , होलिका जल गयी ।।
हिरण्यकशिप ने अनेक प्रकार से प्रह्लाद जी को मारने की कोशिश की , पर सब जगह प्रह्लादजी का रक्षण हो जाता , हिरण्यकशिप ने ब्रह्मा जी से बहुत से वरदान पाए थे पर भगवान अपने भक्त का अपमान नही देख सकते अपने भक्त की रक्षा के लिए अलग रूप से भी अवतरित हो जाते है।
आज भी हम सब होलि का त्यौहार एक भक्त के भरोसे की जीत पर ही मनाते है... जय श्री कृष्ण जय जय श्री राधे
कौन उसको मारे
प्रह्लाद जी की भक्ति देख हिरण्यकशिप ने सोचा की ये मेरा बेटा हो कर शांत कैसे है , मेरा बेटा तो जन्मजात से ही उत्पाती होना चाहिए , ये कैसे शान्ति से रहता है ये कैसे भजन कर रहा है.. इसे मुझे देत्य कुलके हिसाब से बनाना पड़ेगा
और संडाम्रगऋषि के पास विद्द्या अद्ययन करने भेज दिया , जो संडाम्रगऋषि के यहाँ एक ही शिक्षा दी जाती थी मारना कैसे ,पीटना कैसे , लूटना कैसे , भिड़ना कैसे , लेकिन प्रह्लाद जी तो जरा भी ध्यान नहीं देते ,
एक दिन प्रह्लाद जी को हिरण्यकशिप अपनी गोदी में बिठा कर पूछा बेटा क्या शिक्षा पाई ? , प्रह्लाद जी बोले पिता जी , ( श्रवणंम , कीर्तनम , विश्नो ,स्मरणम , पादसेवनम , अर्चनम वंदनम ,दाश्यम , सख्यम , आत्म निवेदम...),
ये नवदा भक्ति है ! पिता जी इन नों भक्ति में से एक भी भक्ति भगवान के चरणों में हो जाये तो जिव का कल्याण हो जाये ! हिरण्यकशिप क्रोधित हो कर बोले "रे मुर्ख तुझे पता है ना ! मुझे भगवान बिलकुल प्रिय नहीं लगते फिर तू क्यों मेरे सामने भगवान का नाम लेता है ? तू जिस नारायण का नाम लेता है वो मेरा सबसे बड़ा सत्रु है , और तुम मेरे पुत्र हो कर मेरे सत्रु का नाम लेता है..
प्रह्लाद जी को फिर से वही संडाम्रगऋषि के यहाँ भेज दिया जहा , मारना ,पीटना , लूटना, भिड़ना इस प्रकारकी शिक्षा दी जाती थी
एक दिन संजोग ऐसा बना की गुरु जी किसी काम से बाहर गए , प्रह्लाद जी ने सब शिष्यों को इकट्टा किया , और सब को कहा सुनो भाई अपनको जन्म देत्य कुल में मिला इसका अभिप्राय ये थोड़ी की अपन भी खोटा खोटा काम करे अपन भी तो भगवान का भजन करके भगवान को पा सकते है ! उन देत्य बालको ने कहा भाई हमको तो भगवान का भजन करना आता नही , कैसे भगवान का भजन करते है ? तू बड़ी अच्छी अच्छी बाते करता है तुही हमे सिखादे ? प्रह्लाद जी बोले जैसे में कीर्तन करू वैसे तुम भी कीर्तन करो,
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो..
संडाम्रग आये बालको को कीर्तन करते देखा , की ये क्या पहले तो एक ही बालक भारी पड़ता था अब तो सब बालक बिगड़ गए ,
संडाम्रगऋषि गए , हिरण्यकशिप के पास बोले " महाराज पहले तो आप का एक बालक ही बिगड़ा हुआ था , अबतो सब बालक बिगड़ गये , हिरण्यकशिप ने अपने सेनिक को भेजा की जाओ उसे पकड़ कर मेरे पास ले आओ , पर जो भी सेनिक जाते, वहाँ सब बालको को कीर्तन करते हुए देखते , और सोचने लगते की राजा की नोकरी खूब करी पर ऐसा सुख ऐसा आनन्द कभी नही देखा , जो होगा सो देखा जायेगा । अपने तीर ,कमान ,भाले ,तलवार , रख देते एक कोने में और सब बाल को के पीछे कीर्तन करने बैठ जाते ।
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो
गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो..
संडाम्रगऋषि फिर आये बोले महाराज पहले तो आप का एक बालक ही बिगड़ा हुआ था, फिर सब विद्यार्थी बिगड़े , अब तो आप की पूरी सेना भी बिगड़ गयी सब आपके सत्रु के कीर्तन में लग गये , हिरण्यकशिप ने सोचा ये छोरा ऐसे नही मानेगा , सारा दिन मेरे सत्रु नारायण का नाम लेता है ।
हिरण्यकशिप ने पहलादजी को मारने का आदेश दे दिया।,
होलिका नाम की एक राक्षसी थी जिस के पास चादर थी , उसने कहा की मैं इस चादर को ओढ़ कर बैठ जाऊ और कोई मुझे आग लगादे तो में बच जाउंगी और मैरि गोदीमे बेठेगा वो जल जायेगा , और पहलाद जी को होलिका की गोदीमे बिठा कर आग लगादी
अचानक हवा ऐसी जोर की चली , वो चादर हवामे उड़ कर प्रह्लाद जी पर गिर गयी प्रह्लाद जी बच गए , होलिका जल गयी ।।
हिरण्यकशिप ने अनेक प्रकार से प्रह्लाद जी को मारने की कोशिश की , पर सब जगह प्रह्लादजी का रक्षण हो जाता , हिरण्यकशिप ने ब्रह्मा जी से बहुत से वरदान पाए थे पर भगवान अपने भक्त का अपमान नही देख सकते अपने भक्त की रक्षा के लिए अलग रूप से भी अवतरित हो जाते है।
आज भी हम सब होलि का त्यौहार एक भक्त के भरोसे की जीत पर ही मनाते है... जय श्री कृष्ण जय जय श्री राधे
Saturday, 23 March 2013
मीराबाई के देवर रतनसिंहजी को भी विश्वास हो गया था की भाभिसा से मिलने ठाकुर जी आते है.....
सावन की तीज के दिन भोजराजजी भी झूले झूल रहे थे , जैसे ही झुला धीमे पड़ा भोजराज के छोटे भाई रतनसिंह ने डोर सहित अपने भाई को बाहों में भर लिया और कहा की अब जल्दी से भाभिसा का नाम बता दीजिये , अब अगर आप ने विलम्ब किया तो मैं झूले से उतरने नही दूँगा ,
भोजराज बोले ("मेड़तिया घर रि थाती मीरा आभ आकाश कुसुम का फूल), इतना नाम सुना फिर तो रतनसिंग आभ आकाश कुसुम फूल का विचार ही करते रहे ,
एक दिन भोजराज को अकेला पा कर रतनसिंग अभिवाद्क कर समीप आ कर बैठ गए ,रतनसिंग ने देखा की भोजराज किसी गहन विचार में मग्न है रतनसिंग बोले बावजी हुकुम....?
भोजराज चोक कर हँस पड़े , बातो बातो में दोनों ही भाई ठठाकर हँस पड़े रतनसिंग ने गंभीर होकर कहा कितने समय बाद आपको ऐसे मुक्त कंठो से हँस ते हुए देख रहा हु।
भोजराज "अच्छा कहो कैसे आना हुआ ? रतनसिंग " बहुत समय से एक बात उथल - पुथल मचाये हुए है अवसर नही मिला और कभी हिम्मत न पड़ी , आज दोनों ही मिल गए है न , भोजराज "हा तो कह डालो , रतनसिंग "पहले वचन दो मेरी बात टालोगे तो नही ? भोजराज हंसते हुए बोले अरे टालने को क्या एक तुम्ही बचे हो ? बहुत लोग भरे पड़े है , रतनसिंग " उस दिन झूले पर आपने भाभीसा हुकुम का नाम लेते हुए उन्हें आभ आकाश का फूल क्यों कहा?
भोजराज बोले "क्या तुम्हारी भाभी तुम्हे बदसूरत दिखाई देती है ? रतनसिंग " नही मैंने आज तक इतनी सुन्दर कही नही देखि विधाता ने सोच - समझ कर जोड़ी मिलायी है , पर आकाश कुसुम कैसे है ? भोजराज " इसीलिए की वह धरा के सभी फूलो से सुन्दर है , रतनसिंग " बावजी हुकुम ! शाश्त्र अभ्यास से भले ही मैं जी चुराता रहा पर थोड़ी समझ आप के इस सेवक में है, इसी कारण वहाँ खड़े इतने लोगो में किसीका ध्यान इस और नही गया किन्तु मैं उसी क्षण बेचैन हो उठा हूँ । क्या इतना अपदार्थ हूँ की .........। रतनसिंग ने भोजराज की और सजल नेत्रों से देखा । भोजराज ने भाई को बाहों में भर लिया - और रुदे कंठ से बोले ऐसा न कहो ऐसा न कहो भाई !
भोजराज कुछ क्षण के लिए चुप होकर सामने कही दूर जैसे क्षीतिज् में कुछ ढूंडने लगे हो तब ,रतनसिंग ने उनके मुखपर आनेवाली उतार - चढ़ाव का निरिक्षण करते रहे , भोजराज काफी देर बाद बोले क्या करोगे सुन कर आभ आकाश कुसुम का फूल क्यों कहा ? ,
रतनसिंग "यह नही जनता पर फिर भी सुन्ना चाहता हु आकाश कुसुम किसे कहते है ? सुन्दर किन्तु जो अप्राप्य हो। भोजराज बोले बस यही है जो तुम जानना चाहते हो । बावजी हुकुम ! रतनसिंग केवल सम्बोधन करके रह गए ,क्षण भर में अपने को संभल कर रतनसिंग ने पूछा क्यों ? कैसे ?
भोजराज बोले यदि तुम्हे ज्ञात हो जाये की जिसे तुम विवाह कर लाये हो वो पर - स्त्री है तो तुम क्या कहोगे ?
रतनसिंग बोले पर स्त्री पर कैसे ? भाभिसा हो या कोई भी स्त्री । कोई भी विवाहिता नारी पुनः विवाह के लिए कैसे तैयार हो सकती है ? मेरी तो बुध्दि ही काम नही कर रही है , कैसे हुआ ये सब ?
भोजराज "मेड़ते में कुवर कलेवे में हमारे बीच कौन था ? रतनसिंग " ठाकुरजी विराजे थे । अच्छा बावजी हुकुम ! वहाँ ठाकुर जी का क्या कम था ? कैसी परम्परा है इन मेड़तियों के वहाँ ? भोजराज बोले , स्मरण हो तुमको ? तुम ने कहा की ये क्या टोटका है ? तब मेने कहा की बींद तो येही है और मैं टोटका हूँ ,रतनसिंग " हाँ हुकुम ! याद आ गया तो क्या भाभीसा.........।
भोजराज " हा बचपन में किसी की बारातको देखकर उन्होंने अपनी माँ से पूछा की की यह कौन है ? उन्होंने बताया की की नगरसेठ की बेटी का बींद है । तुम्हारी भाभिसा ने जिद्द की , की मेरा बींद कौन है बताओ । बहुत बहलाने पर भी ये न मानी तो उनकी माँ ने कह दिया की ये गिरधर गोपाल तुम्हारे बींद है।
बस उसी दिन वह बात इतनी गहरी बैठ गयी की ठाकुर जी को आना ही पड़ा , रतनसिंग ने आश्चर्य से भर कर पूछा ठाकुर की को आना पड़ा ? भोजराज बोले हाँ अक्षय त्तियाकी पहली रात उनका विवाह ठाकुर जी के साथ हो गया। रतनसिंग बोले आप को कैसे विश्वास आया ऐसी बिना सीर -पैर की बात पर ?
भोजराज बोले यहाँ से गया पडला ज्यो का त्यों रखा है , मैंने दोनों ही पडले देखे है , पर द्वारका के वस्त्राभूषण इतने मूल्यवान है की अनुमान लगाना कठीन है । और अभी तीज की रात को भी ठाकुर जी पधारे थे , रतनसिंग बोले आप ने देखा ठाकुरजी को ? नहीं किन्तु जो कुछ देखा उससे ज्ञात हो रहा था की वहाँ तीसरा कोई और भी है , भोजराज जी की बातो से रतनसिंग को भी विश्वास हो गया की भाभिसा से मिलने ठाकुर जी आते है....
मेरे तो गिरधर गोपाल दुसरो ना कोई
जा के सिर मोर मुकुट मेरो पति सोयी
जय श्री गिरधर गोपाल
सावन की तीज के दिन भोजराजजी भी झूले झूल रहे थे , जैसे ही झुला धीमे पड़ा भोजराज के छोटे भाई रतनसिंह ने डोर सहित अपने भाई को बाहों में भर लिया और कहा की अब जल्दी से भाभिसा का नाम बता दीजिये , अब अगर आप ने विलम्ब किया तो मैं झूले से उतरने नही दूँगा ,
भोजराज बोले ("मेड़तिया घर रि थाती मीरा आभ आकाश कुसुम का फूल), इतना नाम सुना फिर तो रतनसिंग आभ आकाश कुसुम फूल का विचार ही करते रहे ,
एक दिन भोजराज को अकेला पा कर रतनसिंग अभिवाद्क कर समीप आ कर बैठ गए ,रतनसिंग ने देखा की भोजराज किसी गहन विचार में मग्न है रतनसिंग बोले बावजी हुकुम....?
भोजराज चोक कर हँस पड़े , बातो बातो में दोनों ही भाई ठठाकर हँस पड़े रतनसिंग ने गंभीर होकर कहा कितने समय बाद आपको ऐसे मुक्त कंठो से हँस ते हुए देख रहा हु।
भोजराज "अच्छा कहो कैसे आना हुआ ? रतनसिंग " बहुत समय से एक बात उथल - पुथल मचाये हुए है अवसर नही मिला और कभी हिम्मत न पड़ी , आज दोनों ही मिल गए है न , भोजराज "हा तो कह डालो , रतनसिंग "पहले वचन दो मेरी बात टालोगे तो नही ? भोजराज हंसते हुए बोले अरे टालने को क्या एक तुम्ही बचे हो ? बहुत लोग भरे पड़े है , रतनसिंग " उस दिन झूले पर आपने भाभीसा हुकुम का नाम लेते हुए उन्हें आभ आकाश का फूल क्यों कहा?
भोजराज बोले "क्या तुम्हारी भाभी तुम्हे बदसूरत दिखाई देती है ? रतनसिंग " नही मैंने आज तक इतनी सुन्दर कही नही देखि विधाता ने सोच - समझ कर जोड़ी मिलायी है , पर आकाश कुसुम कैसे है ? भोजराज " इसीलिए की वह धरा के सभी फूलो से सुन्दर है , रतनसिंग " बावजी हुकुम ! शाश्त्र अभ्यास से भले ही मैं जी चुराता रहा पर थोड़ी समझ आप के इस सेवक में है, इसी कारण वहाँ खड़े इतने लोगो में किसीका ध्यान इस और नही गया किन्तु मैं उसी क्षण बेचैन हो उठा हूँ । क्या इतना अपदार्थ हूँ की .........। रतनसिंग ने भोजराज की और सजल नेत्रों से देखा । भोजराज ने भाई को बाहों में भर लिया - और रुदे कंठ से बोले ऐसा न कहो ऐसा न कहो भाई !
भोजराज कुछ क्षण के लिए चुप होकर सामने कही दूर जैसे क्षीतिज् में कुछ ढूंडने लगे हो तब ,रतनसिंग ने उनके मुखपर आनेवाली उतार - चढ़ाव का निरिक्षण करते रहे , भोजराज काफी देर बाद बोले क्या करोगे सुन कर आभ आकाश कुसुम का फूल क्यों कहा ? ,
रतनसिंग "यह नही जनता पर फिर भी सुन्ना चाहता हु आकाश कुसुम किसे कहते है ? सुन्दर किन्तु जो अप्राप्य हो। भोजराज बोले बस यही है जो तुम जानना चाहते हो । बावजी हुकुम ! रतनसिंग केवल सम्बोधन करके रह गए ,क्षण भर में अपने को संभल कर रतनसिंग ने पूछा क्यों ? कैसे ?
भोजराज बोले यदि तुम्हे ज्ञात हो जाये की जिसे तुम विवाह कर लाये हो वो पर - स्त्री है तो तुम क्या कहोगे ?
रतनसिंग बोले पर स्त्री पर कैसे ? भाभिसा हो या कोई भी स्त्री । कोई भी विवाहिता नारी पुनः विवाह के लिए कैसे तैयार हो सकती है ? मेरी तो बुध्दि ही काम नही कर रही है , कैसे हुआ ये सब ?
भोजराज "मेड़ते में कुवर कलेवे में हमारे बीच कौन था ? रतनसिंग " ठाकुरजी विराजे थे । अच्छा बावजी हुकुम ! वहाँ ठाकुर जी का क्या कम था ? कैसी परम्परा है इन मेड़तियों के वहाँ ? भोजराज बोले , स्मरण हो तुमको ? तुम ने कहा की ये क्या टोटका है ? तब मेने कहा की बींद तो येही है और मैं टोटका हूँ ,रतनसिंग " हाँ हुकुम ! याद आ गया तो क्या भाभीसा.........।
भोजराज " हा बचपन में किसी की बारातको देखकर उन्होंने अपनी माँ से पूछा की की यह कौन है ? उन्होंने बताया की की नगरसेठ की बेटी का बींद है । तुम्हारी भाभिसा ने जिद्द की , की मेरा बींद कौन है बताओ । बहुत बहलाने पर भी ये न मानी तो उनकी माँ ने कह दिया की ये गिरधर गोपाल तुम्हारे बींद है।
बस उसी दिन वह बात इतनी गहरी बैठ गयी की ठाकुर जी को आना ही पड़ा , रतनसिंग ने आश्चर्य से भर कर पूछा ठाकुर की को आना पड़ा ? भोजराज बोले हाँ अक्षय त्तियाकी पहली रात उनका विवाह ठाकुर जी के साथ हो गया। रतनसिंग बोले आप को कैसे विश्वास आया ऐसी बिना सीर -पैर की बात पर ?
भोजराज बोले यहाँ से गया पडला ज्यो का त्यों रखा है , मैंने दोनों ही पडले देखे है , पर द्वारका के वस्त्राभूषण इतने मूल्यवान है की अनुमान लगाना कठीन है । और अभी तीज की रात को भी ठाकुर जी पधारे थे , रतनसिंग बोले आप ने देखा ठाकुरजी को ? नहीं किन्तु जो कुछ देखा उससे ज्ञात हो रहा था की वहाँ तीसरा कोई और भी है , भोजराज जी की बातो से रतनसिंग को भी विश्वास हो गया की भाभिसा से मिलने ठाकुर जी आते है....
मेरे तो गिरधर गोपाल दुसरो ना कोई
जा के सिर मोर मुकुट मेरो पति सोयी
जय श्री गिरधर गोपाल
Tuesday, 19 March 2013
भगवान भी भक्त की प्रतीक्षा में खड़े रह सकते है
भीष्म पितामाह की अंतिम इच्छा है की जबतक मेरे प्राण है तब तक गोविन्द मेरे सन्मुख खड़ा रहे
और कह दिया की "हे गोविन्द जब तक मेरे प्राण न निकले तब तक आप मेरे सामने यु ही खड़े रहो , और प्राण निकल ने की प्रतीक्षा करो ,
जिनकी प्रतीक्षा में पूरा विश्व खड़ा है पूरा ब्रह्माण्ड जिनकी प्रतीक्षा करता है आज भीष्म पितामाह ने त्रिलोकी के नाथ को अपने प्राणों की प्रतीक्षा में खड़ा कर दिया , की हे गोविन्द यु ही खड़े रहो।
ये बात हर कोई नही कह सकता , भगवान को खड़ा रहने का आदेश कोई ज्ञानी नहीं दे सकता , की खड़े हो जाओ मेरे सामने , योगी नही कह सकता की खड़े रहो मेरे सामने, ये शक्ति तो केवल भक्ति में ही है किसी प्रेमी में ही है ये आदेश तो एक भक्त ही दे सकता है , प्रेमी ही दे सकता है ,
और ठाकुर जी प्रेम की ही भाषा समझते है , और मानते भी है
इसलिए
भगवान कहते है की तुम यदि नाचना चाहते हो तो मेरी माया ले जाओ , खूब नाचोगे , माया नचाती है,और मुझे नचाना चाहते हो, तो मेरी भक्ति ले जाओ मेरा प्रेम ले जाओ , मुझ से प्रेम माग लो , जो मुझ से प्रेम करता है में उसके अधीन हु , जो मुझे अपना प्रेमी मानता हो में उसी क्षण उनके प्रेम के बंदन में बंद जाता हु,
इस लिए मैं भी आप सबसे यही कहूँगी , की
प्रभु से करो प्रेम इतना की किसी और से करने की गुन्जाईस ही न रहे
वो मुस्कुराये तुम्हे देख कर तो जिन्दगी में फिर कुछ पाने की ख्वाहिस ही ना रहे
भगवान श्री कृष्ण को पा ले फिर और कुछ पाना बाकि ही नही रहता
{ जय जय श्री राधे }
भीष्म पितामाह की अंतिम इच्छा है की जबतक मेरे प्राण है तब तक गोविन्द मेरे सन्मुख खड़ा रहे
और कह दिया की "हे गोविन्द जब तक मेरे प्राण न निकले तब तक आप मेरे सामने यु ही खड़े रहो , और प्राण निकल ने की प्रतीक्षा करो ,
जिनकी प्रतीक्षा में पूरा विश्व खड़ा है पूरा ब्रह्माण्ड जिनकी प्रतीक्षा करता है आज भीष्म पितामाह ने त्रिलोकी के नाथ को अपने प्राणों की प्रतीक्षा में खड़ा कर दिया , की हे गोविन्द यु ही खड़े रहो।
ये बात हर कोई नही कह सकता , भगवान को खड़ा रहने का आदेश कोई ज्ञानी नहीं दे सकता , की खड़े हो जाओ मेरे सामने , योगी नही कह सकता की खड़े रहो मेरे सामने, ये शक्ति तो केवल भक्ति में ही है किसी प्रेमी में ही है ये आदेश तो एक भक्त ही दे सकता है , प्रेमी ही दे सकता है ,
और ठाकुर जी प्रेम की ही भाषा समझते है , और मानते भी है
इसलिए
भगवान कहते है की तुम यदि नाचना चाहते हो तो मेरी माया ले जाओ , खूब नाचोगे , माया नचाती है,और मुझे नचाना चाहते हो, तो मेरी भक्ति ले जाओ मेरा प्रेम ले जाओ , मुझ से प्रेम माग लो , जो मुझ से प्रेम करता है में उसके अधीन हु , जो मुझे अपना प्रेमी मानता हो में उसी क्षण उनके प्रेम के बंदन में बंद जाता हु,
इस लिए मैं भी आप सबसे यही कहूँगी , की
प्रभु से करो प्रेम इतना की किसी और से करने की गुन्जाईस ही न रहे
वो मुस्कुराये तुम्हे देख कर तो जिन्दगी में फिर कुछ पाने की ख्वाहिस ही ना रहे
भगवान श्री कृष्ण को पा ले फिर और कुछ पाना बाकि ही नही रहता
{ जय जय श्री राधे }
Monday, 18 March 2013
प्रभु को अपने घर बुलाने की गाँठ लगा कर तो देखिये.....
एक व्यक्ति बालाजी के मंदीर जा कर रोज प्रार्थना करता, की हे बालाजी एक करोड़ रूपये की लोटरी लग जाये ,रोज जाता और रोज प्रार्थना करता, एक दीन बालाजी को बहुत ही गुस्सा आया और प्रकट होकर उस व्यक्ति के गाल पर खीच कर एक चाटा मारा ,"व्यक्ति झनझनाता हुआ बोला मेने तो एक करोड़ रुपयों की लोटरी लग जाये कहा था , चाटा तो नही माँगा ,"बालाजी गुस्से में आकर बोले अरे मुर्ख ! कबसे बोल रहा है लाटरी लग जाये -लाटरी लग जाये ,टिकट तो खरीद इतना तो काम तू भी कर सारे काम में ही करूँगा ,तो तू क्या करेंगा ?.......
ठीक उस व्यक्ति की तरह हमारा भी येही हाल है ,की कुछ किये बिना ही सब मिल जाये,श्रम किये बिना ही सब मनोरथ पुरे हो जाये.... सच कहे तो भगवान को हमने परेसान कर के रख दिया है ,मनोरथ माँग- माँग कर , कभी नारियल कभी सवामणि, कभी फीते की गाँठ बांध कर, की हे भगवान हम गाँठ लगा कर जाते है हमारी मनोकामनाए पूर्ण हो जाये...
सबको सिर्फ अपनी पड़ी है , भगवान से तो किसी को कोई मतलब ही नही है ,सब भगवान से चाहते है , पर भगवान को कोई नहीं चाहता !
क्या कभी किसी ने भगवान को घर बुलाने की गाँठ लगायी है ? की हे प्रभु हम आप के दरबार में गाँठ लगा कर जा रहे है आप को शपत देते है, की आप को हमारे घर आना ही होगा, हमारा चित्त आप के चरणों में लगाना ही होगा ,हम्हे आप से प्रेम हो जाये ऐसा जादू चलाना ही होगा..... ,
सच में हम सब आज दुरियोधन जेसे बन गए है ,कभी अर्जुन जेसे बनकर देखिये , प्रभु को अपने घर बुलाने की गाँठ लगा कर तो देखिये ,इश्वर को ! हर कदम आप अपने साथ पाएंगे....,भगवान कहते है की दुःख और सुख तो जीवन में धुप छाव की तरह है ,पर जो निरंतर मुझे भजता है जो मेरा ही स्मरण करता है ,उसे कभी दुःख , दुखी नहीं करता ,क्यों की दुःख में ,में मेरे भक्त को अपनी गोदी में बैठा लेता हु .......
पांडवो जैसा तो दुःख सायद किसी में नही पड़ा होगा .पर भगवान श्री कृष्ण के साथ रहने के कारण उने दुःख कभी दुखी नहीं कर पाया ,और ना ही कभी पीड़ा महसूस की ....बल्कि सब कुछ होते हुए भी दुखी तो कौरव रहे थे, ये हम सब जानते है
भगवान हमारे कर्म को सुध करते है कर्म तो हम्हे ही करना पड़ेगा , बिना पसीने किये कही एषो आराम नहीं मिलते ....
एक व्यक्ति बालाजी के मंदीर जा कर रोज प्रार्थना करता, की हे बालाजी एक करोड़ रूपये की लोटरी लग जाये ,रोज जाता और रोज प्रार्थना करता, एक दीन बालाजी को बहुत ही गुस्सा आया और प्रकट होकर उस व्यक्ति के गाल पर खीच कर एक चाटा मारा ,"व्यक्ति झनझनाता हुआ बोला मेने तो एक करोड़ रुपयों की लोटरी लग जाये कहा था , चाटा तो नही माँगा ,"बालाजी गुस्से में आकर बोले अरे मुर्ख ! कबसे बोल रहा है लाटरी लग जाये -लाटरी लग जाये ,टिकट तो खरीद इतना तो काम तू भी कर सारे काम में ही करूँगा ,तो तू क्या करेंगा ?.......
ठीक उस व्यक्ति की तरह हमारा भी येही हाल है ,की कुछ किये बिना ही सब मिल जाये,श्रम किये बिना ही सब मनोरथ पुरे हो जाये.... सच कहे तो भगवान को हमने परेसान कर के रख दिया है ,मनोरथ माँग- माँग कर , कभी नारियल कभी सवामणि, कभी फीते की गाँठ बांध कर, की हे भगवान हम गाँठ लगा कर जाते है हमारी मनोकामनाए पूर्ण हो जाये...
सबको सिर्फ अपनी पड़ी है , भगवान से तो किसी को कोई मतलब ही नही है ,सब भगवान से चाहते है , पर भगवान को कोई नहीं चाहता !
क्या कभी किसी ने भगवान को घर बुलाने की गाँठ लगायी है ? की हे प्रभु हम आप के दरबार में गाँठ लगा कर जा रहे है आप को शपत देते है, की आप को हमारे घर आना ही होगा, हमारा चित्त आप के चरणों में लगाना ही होगा ,हम्हे आप से प्रेम हो जाये ऐसा जादू चलाना ही होगा..... ,
सच में हम सब आज दुरियोधन जेसे बन गए है ,कभी अर्जुन जेसे बनकर देखिये , प्रभु को अपने घर बुलाने की गाँठ लगा कर तो देखिये ,इश्वर को ! हर कदम आप अपने साथ पाएंगे....,भगवान कहते है की दुःख और सुख तो जीवन में धुप छाव की तरह है ,पर जो निरंतर मुझे भजता है जो मेरा ही स्मरण करता है ,उसे कभी दुःख , दुखी नहीं करता ,क्यों की दुःख में ,में मेरे भक्त को अपनी गोदी में बैठा लेता हु .......
पांडवो जैसा तो दुःख सायद किसी में नही पड़ा होगा .पर भगवान श्री कृष्ण के साथ रहने के कारण उने दुःख कभी दुखी नहीं कर पाया ,और ना ही कभी पीड़ा महसूस की ....बल्कि सब कुछ होते हुए भी दुखी तो कौरव रहे थे, ये हम सब जानते है
भगवान हमारे कर्म को सुध करते है कर्म तो हम्हे ही करना पड़ेगा , बिना पसीने किये कही एषो आराम नहीं मिलते ....
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