Wednesday, 22 July 2015

           मना मनोरथ छोड़  दे तेरा किया न होय !
           पानी में घी निपजे तो लूका खायन कोय !!


हमारे मन की हो जाय , भाई , बंधो , सगे , सम्बन्धी सब हमारे अनुकूल हो जाये , संसार में मान सम्मान, बड़ाई मिल होजाये , लोग हमे अच्छा कहे ,हमारी प्रतिष्ठा बढ़ जाये। ये लालसा प्रत्येक व्यक्ति के भीतर रहती है पर ऐसा कभी होता नही और कुछ समय के लिए हो भी जाये तो सदा टिकता नही |
नाश्वान शरीर को मान बड़ाई में लगने से जीव बंधन में बंधता है
और मनुष्य का पतन होता है पर जब इन सबकी लालसा छूट जाये तो जीव मुक्त होता है और मनुष्य जाती की प्रगति होती है।

संसार में जहा मान बड़ाई प्रतिष्ठा दिखती है वो असल में बंधन का कारण है और जहा मान बड़ाई प्रतिष्ठा की लालसा न हो वह मुक्ति का कारण है।

भगवान हमारे मन की न करे , हमे कोई मान सम्मान न दे ,
केवल हम भगवान के है और एक भगवान ही हमारे अपने है इस के अतिरिक्त हमे जो भी याद हो वो यादास्त ( छीन जाये ) प्रभु ऐसी कृपा करो। ये लालसा हो तो परमात्मा की प्राप्ति उसी क्षण हो जाती है।
       
भगवान कहते है की जो जीव सच्चे ह्रदय से मेरी शरण में आ जाता है और कहता है की
हे नाथ ! मैं आपका हूँ ,तो में उसी क्षण उसके सारे बंधन काट कर उसे मुक्त कर देता हूँ। उस जीव पर कृपा करना सुरु कर देता हूँ ,
जो बंधन के रास्ते बने हुए है उन सब से छुड़ा कर उन्हें मेरी प्राप्ति करा देता हूँ |

जो मेरी प्राप्ति में रोड़ा बने बैठे है उनके सगे , सम्बन्धीयो से उनकी खट - पट करवा देता हूँ फिर वो मुझ में और मैं उनमे रमण करने लगते है......।
ये बिलकुल सच्ची और पक्की बात।
 मनुष्य शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिए ही मिला है बाकि सब कार्य तो पशु पक्षी की योनिमे भी किये जा सकते है पर भगवान की प्राप्ति केवल मानव शरीर मिलने पर ही की जा सकती है।

 जय श्री राधे राधे!


                     अयोध्या निर्माण की कथा !

ये बात पिछले पोस्ट में लिखी हुई है की जब प्रभु श्रीराम अपने धाम गए तब अयोध्या के पेड़ , पोधे वृक्ष , लताये जड़ के सहित उखड- उखड कर भगवान के साथ , भगवत धाम- साकेत में चले गए। यहाँ तक की जब पर्वतोने देखा की प्रभु श्रीराम अपने धाम जा रहे है तब ( जड़ भी चेतन बन कर ) वे पर्वत भी प्रभु श्रीराम के साथ चल पड़े। 

अयोध्या की भूमि सुनी सी हो गयी अयोध्याजी स्त्री के रूपमे प्रकट हो कर विलाप करने लगी की , अरे ! मैं कैसी अभागन हूँ जो यहाँ पड़ी- पड़ी अपने आपको उजड़ती हुई देख रही हूँ..

एक दिन अयोध्या जी दुखी मन से ( सरयूजी नदी )के पास जा कर विलाप करने लगी की , बहिन ! अब तुम्हारा होना भी व्यर्थ रह गया है , मेरे उजड़ जाने से अब हम अकेली रह गयी है। अयोध्या जी और सरयूजी अथाह दुःख के समुन्द्र में डुबी हुई प्रभु श्रीराम की बाते कर रही थी और आँखोसे अश्रुधार बहा रही थी। 
उतने में एक राजकुमार घोड़े पर सवार , हाथ में धनुषबाण लिए वहा से गुजर रहे थे। उस राजकुमारने देखा की यहाँ की भूमि इतनी उजड़ी सी क्यों लग रही है ? यहाँ के पेड़ , पोधे , वृक्ष , लताये कहा चले गए ?

राजकुमारने देखा की दो स्त्रियां सरयूजी के किनारे बैठी दुखी मन से विलाप कर रही है , उनके नेत्रों से झर - झर आसु बह रहे है |

राजकुमार घोड़े से उतरकर उन माताओ को प्रणाम करके कहा की , हे देवियो ! आप कौन है और आप रो क्यों रही हो ?

अयोध्याजी ने कहा महाराज ! मैं यहाँ की भूमि अयोध्या हूँ और ये मेरी सखी सरयूजी है , आप हमारे रोनेका कारण पूछ रहे है पर क्या कहे कुछ कहने की बात नही है ,
पर आप पूछ रहे है तो हम बता देती है

अयोध्याजी ने कहा महाराज ! कुछ काल पहले एक डाकू आया था उसने हमे खूब आनंद दिया था हम उनके आने से धन्य हो गयी थी पर जाते समय वो डाकू यहाँ की सारी सम्पति को लूट कर ले गया हमे उजाड़ कर चला गया

राजकुमारने धनुस पर प्रतंजा चढ़ा कर क्रोधमे भरकर कहा , मा
ताजी ! मैं आपको वचन देता हूँ , मैं सिग्र ही उस डाकू को युद्धमे जीत कर आप की सम्पति आप को वापिस दिलवाकर ही जाऊंगा , आप हमे उस डाकू का नाम बताईये ?

अयोध्या जी बोली , महाराज ! उस डाकू पर आपके धनुस का कोई असर नही पड़नेवाला वे बहुत बलसाली है वे युद्धमे जीते नही जा सकते , वे तो प्रेम से जीते जा सकते है।

राजकुमार   आश्चर्य में पड़गए की डाकू को प्रेम से जीता जा सकता है ! ऐसा कैसा डाकू है ? पर जो भी है आप मुझे उनका नाम बताईये ?

अयोध्याजी ने कहा "वे अखिलब्रह्मांढ नायक परब्रह्मपरमेशवर है मुझे शोभायमान करने के लिए इस धरती पर  (राजा दशरत जी के पुत्र ) बन कर आये थे जो आपके ( पिता श्री राम है ) वहीं  मुझे उजाड़ कर चले गए है।
यहाँ के पेड़ , पोधे , वृक्ष , लताये सब जड़ के सहित उखड़ कर उनके साथ चले गए और में यहाँ उजड़ कर रह गयी हूँ।

वे राजकुमार कोई और नही थे भगवान श्रीराम के छोटे ( पुत्र कुश ) थे महाराज श्री कुश ने कहा ,
माताजी ! अब मैं आप को वचन दे चूका हूँ की आपकी सम्पति आपको दिलवाकर ही जाऊंगा सो में मेरा वचन पूरा कर के ही  जाऊंगा , पर उसमे आपको मेरी सहायता करनी होगी , आप कृपा करके मुझे बताईये , आप जिस रूप में प्रभु श्रीराम के रहने पर  शोभायमान थी , वे सभी यथा योग्य स्थान मुझे बता दीजिये ?
उसके बाद अयोध्याजी और सरयूजी ने प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओ का चरित्र सुना कर जहा - जहा भगवान श्रीराम ने जो लीलाये की वे इस्थान बताये।

अयोध्याजी और सरयूजी के बताये हुवे इस्थान को महाराज ( कुश ) ने यथा योग्य फिरसे स्थापित किया। वे अयोध्याजी फिरसे सज गयी वहां के पेड़ ,पोधे , वृक्ष , लताये फिरसे लहराने लगे।
अयोध्या जी की सम्पति लोटा कर कुश महाराज अपनी राजधानी ( कुशावती ) को चल दिए।

भगवान श्री कृष्ण की उजड़ी हुयी भूमि को उनके पड़पौत्र ( व्रजनाभ जी ) ने फिरसे बसाया था और प्रभु श्रीरामकी जन्म भूमि अयोध्याजी को उनके छोटे पुत्र महाराज ( श्री कुश ) ने बसाया था ऐसा हमे पौराणिक ग्रंथो से मालूम होता है और अनुभव भी....!!

जय श्री सीताराम !
       { जय जय श्री राधे !}
प्रभुश्रीराम जी का अपने धाम पधारना और श्रीसीताजी की निंदा करने वाले धोबी पर श्रीराम जी की कृपा !

जब भगवान श्रीराम अपने धाम को चले उस समय उनके साथ अयोध्याके सभी पशु - पक्षी, पेड़- पोधे मनुष्य भी उनके साथ चल पड़े। उन मनुष्यो में श्रीसीताजी की निंदा करने वाला धोबी भी साथ में था , भगवान ने उस धोबी का हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और उनको अपने साथ लिए चल रहे थे।
जिस - जिस ने भगवान को जाते देखा वे सब भगवान के साथ चल पड़े कहते है की वहां के पर्वत भी उनके साथ चल पड़े।  

सभी पसु पक्षी पेड़ पोधे पर्वत और मनुष्यों ने जब साकेत धाम में प्रवेश होना चाहा तब साकेत का द्वार खुल गया पर जैसे ही उस निंदनीय धोबी ने प्रवेश करना चाहा तो द्वार बंद हो गया।

साकेत द्वारने भगवानसे कहा  महाराज ! आप भलेही इनका हाथ पकड़ले पर ये जगतजननी माता श्रीसीताजी की  निंदा कर चूका है इसलिए ये इतना बड़ा पापी है की मेरे द्वारसे साकेत में प्रवेश नही कर सकता।

जिस समय भगवान सब को लेकर साकेत जा रहे थे उस समय सभी देवी - देवता आकाश मार्ग से देख रहे थे ,

की माताजी की निंदा करने वाले पापी धोबी को भगवान कहा भेजते है।

भगवान ने द्वारबन्द होते ही इधर - उधर देखा तो ब्रह्माजीने सोचा की कही भगवान इस पापि को मेरे ब्रह्मलोक में न भेजदे , वे हाथ हिला - हिला कर कहने लगे , महाराज ! इस पापिके लिए मेरे ब्रह्मलोक में कोई स्थान नही है।

इन्द्रने सोचा की कही मेरे इन्द्रलोक में न भेजदे , इंद्र भी घबराये , वे भी हाथ हिला - हिला कर कहने लगे , महाराज ! इस पापिको मेरे इन्द्रलोक में भी कोई जगह नही है।

ध्रुवजीने सोचा की कही इस पापी को मेरे ध्रुवलोक में भेज दिया तो इसका पाप इतना बड़ा है की इसके पापके बोझसे मेरा ध्रुवलोक घिर कर निचे आ जायेगा ऐसा विचार कर ध्रुवजी भी हाथ हिला - हिला कर कहने लगे महाराज ! आप इस पापिको मेरे पास भी मत भेजिएगा।

जिन - जिन देवताओंका एक अपना अलगसे लोक बना हुआ था उन सभी देवताओंने उस निंदनीय पापी धोबीको अपने लोकमे रखने से मना कर दिया।

भगवान खड़े - खड़े  मुस्कुराते हुए सबका चेहरा देख रहे है पर कुछ बोलते नही |

उस देवताओ की भीड़ में यमराज भी खड़े थे , यमराजने सोचा की ये किसी लोक में जानेका अधिकारी नही है अब इस पापी को भगवान कहि मेरे यहाँ नही भेजदे और माता की निंदा करनेवाले को में अपनी यमपुरी में नई रख सकता वे घबराकर उतावली वाणीसे बोले ,
महाराज ! महाराज ! ये इतना बड़ा पापी है की इसके लिए मेरी यमपुरी में भी कोई जगह नही है।

उस समय धोबीको घबराहट होने लगी की मेरी दुर्बुद्धीने इतना निंदनीय कर्म करवादिया की यमराज भी मुझे नही रख सकते!

भगवान ने धोबी की घबराहट देख कर धोबी की और संकेत से कहा तुम घबराओ मत ! मैं अभी तुम्हारे लिए एक नए साकेत का निर्माण करता हूँ , तब भगवानने उस धोबीके लिए एक अलग साकेत धाम बनाया।
यहाँ एक चोपाई आती है !
सिय निँदक अघ ओघ नसाए ।
लोक बिसोक बनाइ बसाए ।।


ऐसा अनुभव होता है की आज भी वो धोबी अकेलाही उस साकेत में पड़ा है जहा न कोई देवी देवता है न भगवान , न वो किसी को देख सकता है और  न उसको कोई देख सकते है। 



तात्पर्य यह है की भगवान अथवा किसी  भी देवी देवता  की निंदा करने वालो के लिए कही कोई स्थान नही है।
जय श्री सीताराम !!
  { जय
जय श्री राधे }
 

Thursday, 19 March 2015

                   पूरकनाम     राम    सुख    रासी !
                   मनुजचरित कर अज अबिनासी !!

 अर्थार्थ पूर्णकाम, आनंद की राशि, अजन्मा और अविनाशी श्री रामजी मनुष्यों के चरित्र कर रहे थे
उस समय रावणकी विधवा बहिन शूर्पणखा रामजी का सुन्दर रुप देख कर नवयुवती का रूप धारण कर रामजी से कहने लगी की
 ( तुम सम पुरुष मौसम नारी....)
 हे युवराज इस धरती पर तुम जैसा कोई सुन्दर पुरुष नही है और मेरे जैसी कोई सुंदरी नही है चलो हम विवाह कर लेते है।

उस समय लक्ष्मण जी ने शूर्पणखा को अपमानित करके नाक -कान काट कर वहाँ से निकाल दिया और रामजी ने खर-दूषण और उनकी सेना को मार गिराया तब शूर्पणखा रोती बिलखती रावण के पास पहुंची।  वह अनेको भड़काऊ शब्द बोलती हुए कहने लकी की देख रावण ! तुम जैसे कायर की बहन कहलाने से मेरी क्या दसा हुई है।

शूर्पणखा के वचन सुनते ही सभासद् अकुला उठे। रावण ने शूर्पणखा की बाँह पकड़कर उसे उठाया और समझाया की तू अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक-कान काट लिए।

(वह बोली-) अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, जो पुरुषों में सिंह के समान हैं, वन में शिकार खेलने आए हैं। मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे।
वे शोभा के धाम हैं, 'राम' ऐसा उनका नाम है ,

राम.... राम.......!
राम का नाम सुनते ही रावण चौक उठा की राम आ गये !
राम आ भी गए !
राम जी का नाम सुन कर रावण मानो मूर्तिमान सा हो गया। वो नी शब्द हो गया मुखसे कुछ बोला नही जाता
उनको अपने मन में ग्लानि होने लगी की अरे ! नारायण नर रूप में आ भी गए और मैं भजन नही कर पाया।
 रावण का मन खिन सा हो गया और 
शूर्पणखा राम लक्ष्मण और श्री सीता जी का गुणगान किये जा रही है उनका चित निर्मल हो गया , कंठ गदगद हो गया , शरीर पुलकायमान है।

वे फिरसे  कहने लगी की हे दशमुख! जिनकी भुजाओं का बल पाकर मुनि लोग वन में निर्भय होकर विचरने लगे हैं। वे देखने में तो बालक हैं, पर हैं काल के समान। वे परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणों से युक्त हैं
दोनों भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टों का वध करने में लगे हैं और देवता तथा मुनियों को सुख देने वाले हैं। वे शोभा के धाम हैं, 'राम' ऐसा उनका नाम है।
हे भाई !
उनके साथ एक तरुणी सुंदर स्त्री है ,-विधाता ने उस स्त्री को ऐसी रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति (कामदेव की स्त्री) उस पर निछावर हैं। उन्हीं के छोटे भाई ने मेरे नाक-कान काट डाले। मैं तेरी बहिन हूँ, यह सुनकर वे मेरी हँसी करने लगे और
 मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण , त्रिशिरा सहायता करने आए। पर उन्होंने क्षण भर में सारी सेना को मार डाला।

खर-दूषन और त्रिशिरा का वध सुनकर रावण सुन सा हो गया। और समझ गया की भगवान श्री नारायण ( नर रूपमे ) अवतरित हो कर इस धरती पर पधार गए है।

भगवान का नर रूपमे राम अवतार हो गया ये सुन कर
रावण बड़ा प्रशन्न हुआ पर उनको मन ही मन ग्लानि होने लगी , वह खिन मन से अपने महल में चल पड़ा वो रास्ते में चलते - चलते  विचार करने लगा की भगवान इस धरती पर अवतरित हो कर आ भी गए और में भजन नही कर पाया , उनसे प्रेम नही कर पाया क्योकि उन्हें तो प्रेम से ही पाया जाता है पर अब क्या करूँ
( भजन होय नही तामस देहा.. )
अब इस तामसी शरीरसे भजन तो होगा नही पर अब ऐसा क्या करू जिससे उनके हाथो मेरी मुक्ति हो जाये

भगवान अंतर्यामी है रावणके मन की बात समझ गए और सीताजी से कहा
*सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला
*मैं कछु करबि ललित नरलीला
*तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा
*जौ लगि करौं निसाचर नासा

अर्थार्थ हे प्रिये! हे सुंदर पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा, इसलिए जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो और अपनी छाया रूपी सीता को इस कुटिया में विराजित कर लो।

श्रीसीता जी राम जी की बात सुनते ही अग्नि में प्रवेश हो गयी और अपनी छाया रूपी सीता के रूपमे वहां पर प्रविष्ट हो गयी , तब लंकापति राव ने अपनी मुक्ति के लिए छाया रूपी श्री सीता जी का हरण किया था..।
जय श्री राम !!

प्रभु श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ रावण सभी राक्षसो सहित मारा गया पर सूर्पनखा रामजी से ( चित ) नही हठा पायी। रामजी है ही ऐसे की जिसके ह्रदय में विराजमान हो जाते है सो हो जाते है..!

शूर्पणखा रामजी को पति के रूपमे पाने के लिए तपश्या करने लगी  (दस हजार वर्ष
) तक तपश्या की तपश्या से  ब्रह्माजी प्रकट हुए , ब्रह्माजी ने कहा की जिनको पाने के लिए तुम  ( तप ) कर रही हो उन श्रीरामजी का ये मर्यादा पुरषोतम अवतार है , वे तुम्हे इस अवतार में नही अपना सकते पर तुम्हारी तपश्या निष्फल नही होगी वे द्वापरयुग में जब श्रीकृष्ण अवतार में आएंगे तब तुम कुब्जा के रूपमे आओगी तब भगवान तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेंगे

उसी शूर्पणखा को ,प्रभु श्रीराम ने श्रीकृष्ण अवतार में सुंदरी कह कर कुब्जा को गोपियो के सामान सुख प्रदान किया.. !!

 {जय जय श्री राधे }

डर लागे अरु हांसी आवे  अजब  जमाना आया रे !
उलटी चाल चली दुनिया में ताते जीव खबराय रे !!


जयपुर के एक राजा थे नाम नही लेंगे, उनको एक महाभारत की कथा सुनाई गयी
कथा कहने वाले पंडितजी ( ग्रस्ति ) थे पंडित जी ने सोचा राजा बहुत धनवान है और घर मे भी हाथ तंग चल रहा सो राजा के यहाँ से जो दक्षिणा मिलेगी उससे बहुत दिन तक गुजारा चलता रहेगा पंडितजी ने बड़े भाव से महाभारत की कथा कही पोथी वही रख कर आ गए।
 राजा ने भी अपने परिवार सहित कथा सुनी पर दक्षिणा के रूप में कुछ दिया नही। कथा कहे हुए महीना बीत गया पर राजा के यहाँ से कोई खबर नही आई

एक दिन ब्राह्मणी ने कहा की राजा के घर आप कथा तो कह आये पर दक्षिणा के रूप में राजा ने कुछ दिया नही और पोथी भी राजा के यहाँ पर ही रख कर आये। ब्राह्मण ने कहा पोथी इसलिए रख आया की जब राजा दक्षिणा के लिए बुलाएंगे तब ले आऊंगा पर , शायद राजा प्रजा के काम- काज में व्यस्त रहते है इसलिए भूल गए होंगे पर आज तुमने याद दिला दिया तो आज राजा के यहाँ मैं खुद ही चला जाता हूँ ,

ब्राह्मण राजा के , राज महल में पहुंचे सबसे पहले राज महल मे , राजकुमारी मिली , राजकुमारी ने पंडितजी को प्रणाम किया और कहा पंडजी आपने बहुत कृपा की महाभारत कथा सुना कर आप ने तो हमारी आखँ ही खोल दी पहले सुना दी होती तो हमारा कल्याण हो जाता ,
पंडितजी ने कहा , अच्छा बेटी ! तुमने क्या सुना महाभारत की कथा में ?

"बोले पंडीजी ! दाऊजी अपनी बहिन सुबद्रा जी से बहुत प्रेम करते थे पर दाऊजी ने सोचा की अभी मेरी बहिन बहुत भोली है , अधिक स्नेह के कारण उन्होंने विवाह की कोई खास चिंता की नही उसी बीच सुभद्राजी अर्जुन के साथ भाग गयी।
अब हमारे माता पिता भी हमारे विवाह के लिए कोई ख़ास सोच नही रहे है तो अब मैं भी कोई योग्य राजकुमार देख कर उनके साथ भाग जाउंगी।



पंडितजी ने अपना
सिर पिटा की हे राम ! इसने पूरी महाभारत कथा से एक यही शिक्षा ली।

पंडित जी आगे बड़े और रानी मिली ,

रानी ने प्रणाम कर के कहा , महारज ! आप पहले कथा कहते तो मेरा तो भाग्य ही बदल जाता पर अब तो बहुत समय निकल गया और मेरी जवानी भी ढल गयी।
 पंडित जी बोले अच्छा , रानी जी ! कहो ! आपने महाभारत की कथा से क्या शिक्षा ली ?
 "बोले महाराज ! द्रोपदी के पांच पति थे पांच विवाह हुए इसलिए वो पंच कन्या में आ गयी और मैं तो अंधेरे में रह गयी , एक पति से ही संतुष्ट रह गयी।

पंडितजी रानी की बात सुन कर चुप चाप जल्दी जल्दी पाँव उठाने लगे और मुख से राम राम कहते
आगे बड़े और अब राजा का पुत्र राजकुमार मिला।
 राजकुमार पंडितजी को प्रणाम करते हुए कहने लगा , पंडितजी ! आपने महाभारत की कथा सुना कर हमारे भाग्य का रास्ता ही खोल दिया ,

पंडित जी " अच्छा ! आपने क्या प्रेरणा ली ?

बोले महारज ! कंस सब तरह से राज गद्दी के योग्य था पर उनके पिता ने उनको नालायक जान कर राज गद्दी, सोप नही रहे थे , तब उसने अपने पिता उग्रसेन को कारागृह में बंध कर अपने बल के आधार पर राज गद्दी पर बैठ गया , अब मैं भी सोच रहा हूँ की कुछ षडियंत्र करके पिता जी को हटा कर मैं भी राज गिद्दी पर विराजित हो जाऊ।

 पंडित जी के मन में खिन्नता होने लगी की , अरे ! ये क्या दुस्स प्रभाव पड़ा |
पंडितजी विचार करते करते राज दरबार में पहुंचे जहा राजा विराज रहे थे , राजा ने राज गद्दी से उठ कर पंडितजी का सत्कार करते हुए कहा आईये पंडितजी आपने महाभारत कथा सुना कर हमारा बहुत सारा धन खर्च होने से बचा दिया पंडित जी खिन्न भाव से बोले अच्छा ! महाराज आपने महाभारत की कथा से क्या प्रेरणा ली ?
"बोले महाराज ! आज तक हम बिना सोचे समझे ही अपना धन लुटाते रहे पर जब से महाभारत कथा सुनी तब से हमारी तो बुद्धि ही ठिकाने आ गयी हमारा बहुत सारा धन खर्च होने से बच गया
अच्छा ! वो कैसे ?
 बोले जब  कौरवो की सभा में शांतिदूत बन कर श्री कृष्ण पधारे तब दुर्योधन ने कहा केशव ! बिना उद्ध के एक सुई के ( नोक ) के बराबर भी पांडवो को भूमि देनेवाला नही हूँ , अब पांडवो को कुछ चाहिए तो युद्ध कर ले......।
और अब आप को भी कुछ दक्षिणा चाहिए तो हमसे युद्ध कर लो फिर जो चाहो जो ले जाओ

पंडितजी ने कहा महाराज ! आप हमारी पोती वापिस कर लीजिये
जान बची तो लाखों पाये !
 लोट के बुद्धू घर को आये !!
ये हकीकत घटना है जयपुर के राजा की....!



आज भी लोग ग्रंथो मे से अपने मतलब की बात निकाल लेते है और उन पर दोसारोपित करते रहते है पर उसका परिणाम क्या होता है ये नही विचारते ,
अब में आप सज्जनो से पूछती हूँ , क्या महाभारत ग्रन्थ में यही शिक्षा है? जो अच्छाईओ को छोड़ बुराईयो का संग्रह करे ? जिसे पंचम वेद कहा गया है उस में जीव के कल्याण के सिवाय कुछ है ही नही |


जिसमे से गीता जैसा  शास्त्र  निकला  ? जो समय को साक्षी रख कर भगवान ने प्रत्येक जीव के कल्याण के लिए मुक्ति का मार्ग बताया आज वो ग्रथ घर मे रखने से लोग कतराते है की महाभर जैसा ग्रथ घर में  रखेंगे तो कही हमारे घरमे महाभारत न छिड़ जाये पर फिर भी आज हर परिवार में जंग  छिड़ी हुई है , कही बाप बेटे के बीच तो कहि सास बहु के बीच , कही भाई - भाई के बीच तो कही पति - पत्नी के बीच .. इद्यादि सब जंग में फसे हुए है कोई बचा हुआ नही  है।
 { जय जय श्री राधे}

Monday, 2 February 2015


श्री राधा कृष्ण के विवाह की कथा!

एक दिन नन्दबाबा ने सोचा की जब से लाला भयो है तब से गो चरावे नही गयो आज गो चरावे को जाता हूँ ,
बाबा , श्री बालकृष्ण लाल को गोदी में ले कर चल पड़े वे अपने लाला को लाड लडाते - लड़ाते गोए चरते हुए बहुत दूर निकल गए धीरे - धीरे भाण्डीर - वन जा पहुँचे

जहा थोड़ी ही देर में श्री कृष्ण की इच्छा से वायु का वेग अत्यंत प्रखर हो उठा ,
आकाश मेघों की घटा से आच्छादित हो गया तमाल और कदम्ब वक्षो के पल्ल्व टूट - टूट कर गिरने , उड़ने और अत्यंत डरावने उत्पादन करने लगे उस समय महान अन्धकार छा गया। नंदनंदन सामान्य बालक की भांति डर कर रोने लगे।

अपने लाला को डरते हुए रोते देख बाबा को भी भय लगने लगा तब वे शिशु को गोद मे लिए और उनको गर्गचार्यजी की कई हुई बात याद आई तब बाबा ने श्री राधा जी को याद किया,

उसी समय करोडो सूर्यो के समूह की सी दिव्य दिप्ति उदित हुई जो सम्पूर्ण दिशाओ में व्याप्त थी उस दिव्य प्रकाश में बाबा ने श्री राधाजी को देखा।

श्री राधाजी पहले ही सोलह शृंगार कर प्रकट हुई थी।

श्रीराधा जी के दिव्य तेज से अभिभूत हो बाबा ने तत्काल उनके सामने मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा-राधे ! ये साक्षात पुरषोतम है और तुम इनकी मुख्य प्रणवल्लभा हो , यह गुप्त रहस्य में गर्गजी के मुख से सुनकर जानता हूँ।

हे राधे ! अपने प्राणनाथ को मेरे अंक से ले लो ये बादलो की गर्जना से डर गये है इन्होने लीलावश यहाँ प्रकृति के गुणों को स्वीकार किया है इसिलए इनके विषय में इस प्रकार भय भीत होने की बात कही गयी है।

नन्दबाबा ने कहा की तुम अपने प्राणनाथ को मेरे अंग से ले लो और अपने घर जाओ।
बाबा के कहने का तात्पर्य यह था की तुम अपने प्रीतम को साथ ले कर (निकुंज) में जाओ क्यों की घर उसी को कहते है जहा ग्रहणी होती है , अब राधाजी ग्रहणी है तो जहा ( राधा कृष्ण ) होंगे वो राधा जी का घर हो ही गया। 

राधाजी ने अपने प्राणनाथ को बाबा से ले कर अपने अंग में भर लिया और श्रीकृष्ण राधाजी के छाती से एक शिशु की भांति चिपक गये , फिर जब , नन्दराय जी श्रीराधा जी को प्रणाम कर के चले गए तब श्रीराधा जी भी भाण्डीर वन में निकुंजकी लताओं में गयी।

वहा की भूमि अत्यंत सुशोभित थी क्योकि जहा (श्रीराधा कृष्ण का विवाह ) हो रहा हो वहाँ पर पृथ्वी नाच उठी और अपना दिव्य रूप प्रकट कर अपने आपको सजाने के लिए प्रकति को आदेश दे दिया


यमुना जी भी सुन्दर शृंगार कर वहां उपस्थित हो गयी , अन्य नदियाँ और सरोवर भी अपने सौंदर्य को प्रकट कर वह उपस्थित हुए , वहाँ की सजावट देखे कैसे ?क्यों की हमारी नजर ही नही टिकती वहाँ की सजावट जो प्रकृति ने की उसकी शोभा वर्ण करने का सामर्थ्य मुझमे नही है इसलिए उस अध्भुत दिव्य सुन्दर भूमि को मैं साष्टांग प्रणाम करती हूँ।

वहां की सुन्दर सोभा को देख श्री श्यामसुन्दर भी ललचा गए उस दिव्यधाम निकुंज की शोभाकला अवतरण होते ही अपने शिशु अवस्था को छोड़ साक्षात पुरषोतम घनश्याम भगवान श्री कृष्ण किशोरावस्था के अनुरूप दिव्य देह धारण कर श्री राधाजी के समुख खड़े हो गए।
उनके श्री अंगों पर पीताम्बर , हाथ मे बंशी , कानो में कुंडल , बाहो मे बाजूबंद , गले में.. , कंठ में सुन्दर आभूषण सोभा पा रहे थे , श्रीकृष्ण भी दुल्ल्हा सा ही रूप धारण कर प्रकट हुए थे।

उन्होंने हँसते हुए अपने प्रियतमा श्रीराधा जी का हाथ अपने हाथ में थाम लिया और उनके साथ ( विवाह - मंडप में प्रविष्ट हुए )

उस मंडप में विवाह की सब सामग्री संग्रह करके रखी गयी थी , मेखला , कुशा , सप्तमत्तिका और जल से भरे कलस आदि उस मंडप की शोभा बढ़ा रहे थे।

वहाँ एक श्रेष्ट सिंघासन प्रकट हुआ , जिस पर वे दोनों प्रिया प्रियतम एक - दूसरे से सट कर विराजित हो गए और अपनी दिव्य शोभा का प्रसार करने लगे
वे दोनों एक दूसरे से मीठी - मीठी बाते करते हुए मेघ और विदित की भांति पानी प्रभा से उद्दीप्त हो रहे थे , उसी समय देवताओ में श्रष्ट भगवान ब्रह्माजी आकाश से उतरकर भगवान श्री कृष्ण के सन्मुख आये और उन दोनों के चरणो मे प्रणाम करके हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे........!!

उसके बाद श्रीराधावल्लभ का विवाह श्री ब्रह्माजी ने विधिवत से सम्पन करवाया , सभी देवी देवताओ ने पुष्पो की वर्षा की


विवाह सम्पन होने के बाद सभी देवी देवता श्री राधा जी को प्रणाम कर के
  अपने अपने स्थान चले गए और प्रिया प्रियतम अपने ( निकुंज ) मे पधार गए , वह वे एक दूजे का शृंगार करने लगे पहले भगवान श्री कृष्ण ने अपनी प्रियतमा का अपने हाथो श्रंगार किया , सुन्दर वेणी बनायीं , कजरे लगाए  , नेत्रोमे कालज की पतली रेखा खीच दी तथा उत्तमोत्तम रत्तनो और फूलो से भी उनका श्रंगार किया राधाजी का पूर्ण शर्बगर् होने पर ,
जैसे ही श्रीराधा जी अपने प्रियतम का श्रंगार करने लगी उसी क्षण श्री कृष्ण अपने किशोरावस्था को त्याग कर छोटे से बालक बन गए , नंदबाबा ने जिस शिशुको जिस रूप में श्रीराधा जी के हाथ में दिया था उसी रूप में वे धरती पर लौटने लगे और भय से रोने लगे।

श्रीहरि को इस रूप में देख कर श्रीराधा जी तत्काल विलाप करने लगी और बोली हरे ! मुझपर माया क्यों फैलाते हो ? इस प्रकार विषादग्रस्त होकर रोती हुई श्रीराधा से सहसा आकाशवाणी ने कहा 
राधे ! इस समय सोच मत करो तुम्हारा मनोरथ कुछ काल के पश्चात पूर्ण होगा इतना कह कर आकाशवाणी भी चुप हो गयी श्री राधा जी अपने प्राणधन को ले कर नन्द बाबा के घर श्री यशोदा जी के हाथो सोप आई....!!
  { जय जय श्रीराधे } 


Saturday, 24 January 2015

श्रीसीता स्वयंवर

श्री सीता राम , लक्ष्मण उर्मिला , भरत जी मांडवी और शत्रुघ्न श्रुतकीर्ति  के शुभ विवाह का भजन ! 
  
आज मिथला नगरिया निहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!

माथे मणि मोरिया कुंडल सोहे कानवा !
कारें कारें कजरारे  जुल्मी   नयनवा
!!
लालचंदन सोहे इनके भाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!

सावर सावर गोरे गोरे जोड़ियां जवान है !
आंखियां देखलि सुनलिनी कान है
!!
जुग जुग जोड़ी जीवे बे मिसाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कामल सखियाँ !!

गगन  मगन आज मगन   धरतीयाँ !
देख देख दूल्हा जीके सावरी सुरतियाँ !!
बाल , वृद्ध , नर , नारी सब बेहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ !!

आज मिथला नगरिया निहाल सखियाँ !
चारों दूल्हा में बड़का कमाल सखियाँ!!

  { जय जय श्री राधे } 

Friday, 16 January 2015

               प्रभु श्रीराम की नरलीला !!
चम्पा - चमेली तुही बतादे ! 

सीता कहाँ पुकारे राम.... ?

रावण ने जब मायावी सीताजी का हरण किया उस समय भगवान श्रीराम नर लीला करते हुए साधारण मनुष्यो की भांति , विलाप करने लगे-) हा गुणों की खान जानकी! हा रूप, शील, व्रत और नियमों में पवित्र सीते... !
और वृक्षों की पंक्तियों से पूछते हुए चलते है ..
 
* हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
भावार्थ:- हे पक्षियों! हे पशुओं! हे भौंरों की पंक्तियों! तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरों का समूह, प्रवीण कोयल,॥

प्रभु श्रीराम बाकि रास्ते में तो लक्ष्मण जी को अच्छी - अच्छी कथाये सुनाते चलते है , की हे भरत ! तुम सावधान हो कर सुनो, जिसका मेरा गुण गाते समय शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ.. अनेको ज्ञानोपदेश देते है पर जैसे ही ऋषि मुनियो के आश्रम देखते है , वे पुरषोतम भगवान जोर - जोर से रोने लग जाते है। एक साधारण मनुष्य की भाति पत्नी के वियोगमे रुदन करने लगते है , उनके पीछे - पीछे चलते हुए लक्ष्मण जी को भी रोना पड़ता है , फिर जैसे कुछ दूर गए तो रोना बंद, और ज्ञानोपदेश शुरु।

लक्ष्मण जी ने सोचा की भैया बाकि रास्ते तो अनेको ज्ञानोपदेश देते चलते है पर जैसे ही ऋषियों के आश्रम देखते है ये साधारण मनुष्यो की भाति रोने क्यों लग जाते है ?

लक्ष्मण जी इस बात को समझ नही पाये पर भगवान उनके लिए रो रहे है जिनको अग्नि में सुरक्षित रख आये है।

यहाँ भगवान ने सीता मईया से कहा की ,
"सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥

अर्थात:- हे प्रिये! हे सुंदर पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा, इसलिए जब तक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो।

जब सीता जी का हरण हुआ ही नही तो रुधन क्यों ? इसपर
भक्तो के भाव है की भगवान ऋषियों के आश्रम के आगे से साधारण मनुष्य की भाति पत्नी के वियोग में इसलिए रुधन करते हुए चल रहे है , मानो ये सिद्ध ऋषियों की पहचान करते हुए चल रहे हो।

कुछ ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य बने बैठे है ,
कुछ पत्नी के साथ रहते है ,
और कुछ ये सोच रहे है की पत्नी का होना तो जरुरी है ताकि समय पर भोजनादि मिलता रहे।

अब भगवान को पत्नी के वियोगमे रोते देख कुछ ऋषि बोले अरे भाई ! देखो - देखो ये राजा सम्राट दशरथ के पुत्र कौशल्यानंदन होते हुए भी अपनी
पत्नी के वियोग में रो रहे है फिर हमतो ठहरे साधारण मनुष्य कही हमारी पत्नी का भी कोई अपहरण न करले सो चौकन्ने हो जाओ। उनका चित भगवान से कुछ हठ कर स्त्रियों में लग गया , वे नाम के ऋषि मुनि रह गए।

कुछ ऋषि रामजी को देख कर ये सोचते थे की अरे भाई ! देखो स्त्री का होना कितना आवश्यक है , ये भगवान होते हुए भी इनको स्त्री की कितनी आवश्यकता है फिर हमतो
ठहरे मृत्युलोक के साधारण मनुष्य इसलिए हमे भी विवाह कर लेना चाहिए वे ऋषि मुनि अधकचरे ब्रह्मचर्य थे जिनका मन भोगविलास में रमणित हो रहा था।

कुछ ऋषियों ने सोचा की ये साक्षात परमब्रह्म परमात्मा होते हुए भी एक साधारण मनुष्य की भाति पत्नी के वियोग मे पड़े हुए है , मानो ये हमको संकेत दे रहे है की तुम ब्रह्मचर्य व्रत करते हुए भी पत्नी में आशक्ति रखते हो तो सोचलो तुम्हे भी मेरी तरह रोना पड़ेगा।

उस समय कहते है की जो ऋषि मुनि अपनी पत्नियों के साथ रह रहे थे उन सिद्ध ऋषियों ने अपनी पत्नियों को आश्रमसे बाहर निकाल दिया।

अब सोचने की बात है की भगवान ने ऐसा क्यों किया भगवान को ऐसा संकेत नही देना चाहिए।

हम साधारण मनुष्य के भीतर ऐसे ही सवाल उत्पन होंगे पर जो भगवतशरणागत हो गए जिन्होंने भगवान के नाम का सुहाग का चोला पहन रखा हो , जो संत पोशाक होती है , वे सोचते है हमको कुल्टा स्त्री नही बनना , हम भगवान की पतिव्रता नारी ही रहना चाहते है , क्योंकी भगवान जगतपति है , उस नाते ये जितने भी जीव है सब भगवान की स्त्रीया है , विश्व भरका दूल्हा तो एक ठाकुरजी ही है  ,

ऐसे महात्माओ के लिए भगवान को छोड़ कर और किसी की कोई आवश्यकता नहीं।

भगवान का भी अपने प्राण प्यारे भक्तो के प्रति ऐसा ही भाव होता है की जो निष्काम भाव से मुझे भजता है जो अकिंचन हो , जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो उन्हें मेरी प्राप्ति सहज ही हो जाती है , फिर वो मुझमे और मैं उनमे रमण करने लग जाते है , उस आत्मा में और मुझ परमात्मा में कोई अंतर नही रह जाता।

भगवन ओरु भगतन में अंतर निरंतर नाही !
भगवन  ही भगतनका रूपधरी आये है !!
भगवान और भक्तके प्रति ऐसे ही मेरे भाव है.. कुछ गलती हो तो क्षमा कीजियेगा ! 
 जय श्री राम !!

     { जय जय श्री राधे }

Monday, 10 November 2014

            हरी जन तो हारे भले जितण दो संसार !
            हारे हरिपुर  जावसी जीते यमके  द्वार !!


एक बार सब लंकावासी मिल कर रावण के पास गए और बोले महाराज ! आप तो रामजी के प्रबल विरोदी है और आप के भाई विभीषण जी तो रामजी के परम  भक्त है , वे सब  दिन राम नाम की रट लगाये रहते है और पुरे घरमे भी राम राम लिखा रखा है , और तो और हाथ में झोली माला ले कर  सब दिन राम राम करते रहते है और महाराज ! घरमे भी राम नाम का कीर्तन होता है ,
"श्री राम जय राम जय जय राम....
लंका वासियो ने रावण को खूब भड़का दिया।

रावण क्रोध से तिलमिला उठा और कहा विभीषण को बुलाओ ,
विभीषण जी आये और कहा ये लोग क्या कहते है तुम्हारे घरमे राम राम लिखा है
"बोले हाँ ! लिखा है
' बोले हाथमे झोली है , क्या जपते हो ?
"बोले ' राम राम..
विभीषणजी की बात सुन कर रावण तिलमिला कर बोला ,
' तुम मेरे शत्रु का नाम जपते हो ?
विभीषणजी "बिलकुल नही.....
विभीषण जी ठीक ही तो कह रहे थे रामजी किसीके शत्रु है ही नही , वे तो प्रत्येक जीव के हितैसी है।

रावण बोला फिर राम - राम क्यों जपते हो ?
विभीषणजी ने सोचा की सच कहूँगा तो ये दुष्ट  मेरे भजन में बाधा पहुचायेगा

विभीषणजी बोले " महाराज ! ये शिकायत करने वाले नाम के रहष्य को नही समझते , मैं तो मेरे भईया भाभी का नाम जपता हूँ पर , क्या कहे ! ये चुगलखोर नाम की महिमा नही समझ पाते , मैं अपने भईया भाभी का भक्त हूँ इसलिए राम नाम जपता हूँ।

रावण बोला राम राम जपने से तुम मेरा और तेरे भाभी का भक्त कैसे हुआ ?
"बोले महाराज ! आप त्रिलोकी के विजेता हो कर भी मंद्बुधियो की भांति बात करते है।
" आप का नाम रावण है की नही ?
' बोले हाँ ! है
" बोले भाभीका नाम मंदोदरी है की नही ?
' बोले हाँ ! है
अब आप भी ( राम नाम ) का रहस्य समझ लीजिये।
( रा माने रावण )
( म माने मंदोदरी ) आपका और भाभी का पूरा नाम लेनेमें कठिनाई होती है इसलिए संगसेप में ही ( राम नाम ) जप लेता हूँ।
रावण ने विभीषण जी को ह्रदय से लगा लिया और कहा की भाई हो तो विभीषण जैसा।
'प्रसन्न हो कर बोला , हाँ ! विभीषण इस भावसे तुम चाहे जितना राम राम करो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।

विभीषण जी झूट बोल रहे थे वे केवल राम भक्त है भईया भभीसे उनको क्या लेना देना पर रावण से पिंड छुड़ाने के लिए रावण को प्रसन्न करने वाली बात कही।
तात्पर्य यह है की कोई जीव भगवतशरणागत हो जाये और किसी भी तरह की बाधा आये तो उन बाधाओ को लाग कर किसी भी युक्ति से भगवत शरणागत हो जाना चाहिए , किसी भी युक्ति से केवल भगवान के हो जाओ !

जे   रति    होइ    सियाराम    सु !
सुमिरत रात दिवस तन, मन सु !!

  , एक ही ध्यान रहे , हम भगवान के है और एक भगवान ही हमारे अपने है।  { जय जय श्री राधे }

संत श्री कबीरदासजी के प्राकट्य की कथा
भक्ति बीज पलटे नही जो जुग जाये अनंत !
उच्च - नीच  कुल  उपजे   रहे  संतको  संत !!

एक सिद्ध महात्मा थे श्री रामानन्दचार्य जी उन्ही महात्मा का एक शिष्य था ब्राह्मण जो नित्य उनकी सेवा में उपस्थित रहता था।
 एक दिन उन ब्राह्मण को किसी आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ा उन ब्राह्मण ने श्री रामानन्दचार्य जी की सेवा में अपनी पुत्री को भेजा

 उस ब्राह्मण कन्या ने बड़े भावपूर्वक समस्त कार्य किया , जब घर जाने लगी तो श्रीस्वामीजी के श्रीचरण -कमलों में प्रणाम किया तो श्री स्वामीजी ने सहज भाव से आशीर्वाद दिया - पुत्रवती भव।
 यह सुनकर ब्राह्मण कन्या संकुचित हो गयी और हाथ -जोड़कर बोली , महाराज ! मैं तो अभी क्वांरी हूँ।  ब्राह्मण कन्या की बात सुन कर स्वामी श्री रामानंदचार्य भी किंचित विचार में पड़ गए।

इसी बीच श्री विष्णु भगवान का आदेश ले कर करुणामय भगवती श्री लक्ष्मी जी कलयुग के जीवो पर दया कर भू - लोक में पधारी उन्होंने विचार किया की कलयुग के लोगो का कल्याण तभी संभव है जब किसी समर्थ भक्त का अवतार हो।

इसी चिंता में विनिमग्न श्री लक्ष्मीजी घूमती - फिरती ( काशी में ) श्री रामानन्दचार्य जी के पास आई।

यहाँ आने पर देखा तो श्री स्वामीजी भी ब्राह्मण  कन्या को आशीर्वाद देकर विचारमग्न ही थे।
तब लक्ष्मीजी ने ब्राह्मण कन्या को एक तुलसीपत्र दिया और  स्वामीजी ने भी कुछ पुष्प प्रसादी दी। लक्ष्मीजी ने तुलसीपत्र देते हुए कहा की तुम स्वामीजी की पुष्प प्रसादी एवं ये तुलसीपत्र लो , और अपनी झोली में भर लो इससे श्रीस्वामीजी का वरदान भी व्यर्थ नही होगा और तुम्हारा कन्यात्व भी सुरक्षित रहेगा।

ब्राह्मण कन्या ने तुलसीपत्र और पुष्प प्रसादी अपने आँचल में ले ली, कुछ दूर चलने पर उसे वजनसा मालूम हुआ तो विचार की स्वामीजी ने ( वा लक्ष्मीजी ) ने तो  फूल ही दिया था फिर यह इतना भारी क्यों लग रहा है ? जब उसने देखा तब समझा की यह तो पुष्पो के स्थान पर एक परमदिव्य सुन्दर ( शिशु ) प्रकट हो गया है।

लोक - लज्जावश वह ब्राह्मण- कन्या उस शिशु को लहरतारा - तालाब के तट पर रखकर चली गयी। (1455 ज्येष्ठ पूर्णिमा सोमवार ) के दिन ही कबीरजी का प्राकट्य हुआ उस दिन दैवयोगवश नीरू - नीमा नाम के जुलाहा दम्पति उसी मार्ग से कही जा रहे थे।

नीमा को प्यास लगी थी वह जब लहरतारा में जल पिने गयी तो उसने , इस परम सुन्दर शिशु को कमल पत्रों पर खेलते देखा।

उसके हृदय में मातृत्व भाव जगा , वातसल्य उमड़ा , उसने शिशु को गोद में उठा लिया अब तक उसकी गोद भी पुत्र से खाली ही थी , उसने शिशु को लेकर नीरू  को दिखाया।  नीरू ने प्रथम तो आनाकानी की परन्तु बाद में पत्नी का अनुग्रह देखकर घर ले चलने की अनुमति दे दी , इस प्रकार श्री कबीरदासजी का पालन पोषण इन्ही नीरू - नीमा के हाथो  हुआ..| भक्तमाल ग्रन्थ में एक पद भी आता है
यथा वन्दौ श्रीप्रह्लाद जिन ,धार्यो रूप कबीर।
कलिमद  मर्दन वीरवर सिद्धि समर रणधीर।।

इस पद के अनुसार
भक्त शिरोमणि श्री प्रह्लादजी के अवतार कबीरदासजी ही है
    { जय जय श्री राधे }
 


Friday, 31 October 2014

गोपाष्टमी की गो पालक भारत वासियोको हार्दिक शुभ कामनाये 
बालकृष्ण लाल की गोचारण लीला के कुछ सब्द

भगवान वृन्दावन में बड़े - बड़े पहाड़ो और जंगलो में गौ चरण के लिए जाते थे पर मईया के बहुत कहने पर भी कभी जूती धारण नही की थी।

एक दिन मईया अपने लाला को गौ चरण के लिए श्रृंगार कर रही थी तब मईया ने अपने लाला को पद्म धारण करने के लिए फिर से आग्रह किया कि
"देख लाला ! तुमरे चरण बहुत कोमल है और तू गईया चरावे जावेगो तो तुमरे पैरो में कंकर , कंटक लग जायेंगे इसलिए व्यर्थ का हट छोड़ दे , हमारी बात मानले और पग में जूती धारण करले !

ठाकुरजी ने कहा अच्छा मईया ! जब तुम इतना आग्रह कर रही है तो ठीक है पर , मैं एक ही शर्त पर जूती धारण कर सकू हूँ , पहले हमारी जितनी भी गईया है उनसबके लिए जूती बनवालियो , जब हमारी गईया जूती पहनके चलेगी तब मैं भी जूती पहन लूंगा !

मईया हंस कर बोली हरे लाला ! तू बड़ो भोलो है गईया कभी जूती पहिने है ? गायतो पशु होवे है ,
ये सुन कर ठाकुरजी धरती पर उलट पुल्ट हो कर रोने लगे , सारा श्रृंगार बिगाड़ लिया , और बोले अरी मईया ! हमारी ( ईस्ट देव ) को तुमने पशु कैसे कह दिया ? गाय तो हम सबकी माता होवे है , फिर ( माँ ) पशु कैसे हो गयी ?

लाला का रुदन देख कर बाबा और मईया घबराएं कि अब लाला को कैसे मनावे , गाय को पशु कहने कि गलती हो गयी , तब मईया और बाबा ने कान पकड़े और बोले ,
अरे लाला ! हमसे बहुत भारी गलती हो गयी , हमको क्षमा करद्यो , आज के बाद गाय को कभी पशु नही कहेंगे , आज से गौ माता हम सबकी ईस्ट देव ही होगी..

मईया ने फिर से ठाकुरजी को जैसे तैसे मनाया और फिरसे गौ चरण के लिए राजी किया..

जरा विचार करे कि जब भगवान को ये सहन नही होता कि गाय को कोई पशु कहे , जब वो ही गौ धन कटनी में जाता है तब भगवान के कष्ट कि सीमा नही रह जाती..

गोविन्द चले आओ ,गोपाल चले आओ !
तेरी गईया तुझे पुकारे , संकट से बचा जाओ !!


        { जय जय श्री राधे }
   


Thursday, 16 October 2014

               सुदामाजी और संकोचिनाथ की कथा

ऐसो  बेहाल  बेवाइनसै माग  कंटक  जाल  गड़े  पुनि जोए।
हाय महादुःख पाये सखा ! तुम आये इतै न, कितै दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करी के  करूणानिधि  रोये।

पानी  परातको हाथ छुयौ  नहीं  नैननिके  जल ते  पग धोये।।
इसीको संकोचिनाथ कहते है !

आपसे धीरेसे- एकांत में सलाह की भांति एक बात कहूँ ?

श्रीनन्दबाबा का लाल बहुत संकोची है इस संकोचिनाथ से मांग कर इसे और अधिक संकोच में मत डालिये , आप कुछ माँगेगे , कुछ प्रार्थना करेंगे तो बड़ा संकोच बड़ा दुःख होगा इसे , इन्हे लगेगा की मैं इतना अयोग्य - इतना प्रमत्त, इतना कृपा - कृपाण हूँ की मेरे स्वजनोंको कहना पड़ता है- उनको प्रर्थना करनी पड़ती है।
इस आनंदकंद से प्रमाद नही होता -  यह अपने भक्तो के मंगल - विधान में लगा ही रहता , यह भी आप समझते है।

कोई एक बार इनके आगे सिर झुका देता है तो ये संकोच से गढ़ जाते है की मैं तो इनका कोई बड़ा हित नही कर पाया अब तो जितना बड़ा उसकी दृष्टि भी उतनी  बड़ी , अब हितभी उतनाही बड़ा होगा।
सुदामाजी तीन मुट्ठी चिउड़े ही तो भेट में ले गए थे वो भी संकोच के मारे श्रीकृष्ण को दे नही रहे थे , द्वारिका का वैभव देख कर सुदामाजी को साहस नही हुआ था की उस चिउड़े का उपहार द्वारिकाधीश को अर्पित करे , वे उस अपनी बगल में दबाये - सिकुड़े जा रहे थे , किन्तु श्रीयशोदानन्दन कही ऐसे मानने वालो मे से  है? ये तो अपनो से वस्तु छीन कर भी खा लेते है।
अब श्रीकृष्ण ने अपने मित्र से पूछ लिया - 'भाभीने मेरे लिए क्या उपहार भेजा है ?
सुदामाजी क्या कहते ? उन्होंने मस्तक झुका लिया 

उनका मस्तक झुका और श्रीकृष्ण का ( हाथ ) बढ़ा - 'यह आप बगलमे क्या दुबकाये है ? सुदामाजी ने और कसके दुबका दिया पोटली को , जिससे श्रीकृष्ण खीच ना पाये , पर श्रीकृष्ण के आगे कोई दबा सकेगा ? उनको कोई रोक सकेगा ? श्रीकृष्ण ने पोटली को खींचा इससे पोटली का वस्त्र फट गया चिउड़े निचे पादपीठ पर और भूमि पर बिखर गए। 
श्रीकृष्ण ने कहा , ओह !  यह उपहार ! भेजा है भाभीने  ! श्रीकृष्ण भेटकी प्रशंन्सा करने लगे 'इतने उत्तम चिउड़े !
उस चिउडों को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई ( महीनो का अकालका मारा क्षुधातुर अन्नपर टूट पड़े ) उस आतुरतासे श्यामसुन्दर पर्यंक से भूमि पर
उत्तरा और उन चिउडों को समेटने लगे। पादपीठपर , भूमि पर - जहाँ
अपने ही नही सेवको तक के पैर पड़ते है , वहीँ गिरे - बिखरे चिउड़े (त्रिभुवन का स्वामी कंगाल ) के समान आतुरता से समेट रहा था और इनमे समेट लेने तक का धैर्य भी पूरा नही था।
एक मुट्ठी समेट कर अपने मुख में डाली और चबाते हुए बाकि चिउड़े बीनने लगा चिउड़े चबाते - चबाते कहने लगे , उ हा ! प्यारे मित्र ! ये परम स्वादिष्ट है !

भगवान सुदामाजी के चिउड़े चबा रहे थे उस समय पुरे विश्वरूप को ये तृप्त कर दे रहे थे ,
 आकाशमार्ग में खड़े देवता देख रहे है और अपने ओठो पर जीभ फेर रहे है जैसे ही भगवान ने चिउड़े चबाके भीतर निगले उसी क्षण देवताओंने तृप्त हो कर डकार ली और पेटपर हाथ फेरने लगे

अब आप इन मोहन का शिष्टाचार देखिये , वेदो में ये ही , वेदवाणी बन कर कहते है की चलते फिरते भोजन करना ( वर्जित ) है और यहाँ ये खुद शास्त्र की मर्यादा के विपरीत है ही ; किन्तु जब कोई अत्यंत आतुर हो जाये तो शिष्टाचार या मर्यादा का स्मरण कहा रहता है।

उसके बाद क्या हुआ आप सभी जानते ही है ! श्रीद्वारिकाधीश ने अपने मित्र को नविन वस्त्र पहनाये थे पर  , जब वे श्रीकृष्ण से विदा ले कर वापिस अपने घर जाने लगे तो , उस नटखट ने हंसकर कहा ,

अच्छा ! मित्र ! आप अपना अमूल्य उत्तरीय एवं धोती तो लेते ही जायँ , सुदामाजी ने सोचा ओहो ! इन श्रीकृष्ण को तो अपनी धोती और उतरिये का भी मोह है पर इस नटखट को सुदामाजी नही समझ पाये ,

द्वारिका के वस्त्र उतरवाने का भाव श्रीकृष्ण का यह था की यह वस्त्र मेरे ( अकिंचन ) भक्त के धारण किये हुए है इसलिए  इन्हे तो श्रीकृष्ण मस्तक पर लपेटेगा और प्राण के सामान सँभाल कर रखेगा क्यों की मित्रके धारण किए हुए वस्त्र जो है पर इनके कहने का ढंग तो देखिये , की अरे मित्र ! हमारे नविन वस्त्र उत्तार दो और अपने फ़टे पुराले वस्त्र लेते जाओ
 

सुदामाजी भी हंसकर बोले अरे ! हाँ ! कृष्ण मैं दरिद्र ब्राह्मण कहा इनको पहन कर अच्छा लगता हूँ !

 सुदामाजी अपनी मैली फटी धोती लपेटते हुए द्वारिका के वस्त्र उतारते- उतारते कहा ,
 चलना पैदल' मांगना भीख और ये कपडे ! कोई दो मुट्ठी अन्न देनेवाला भी होगा तो इन वस्त्रो को देख कर मुख मोड़ लेगा
अब सुदामाजी को कहा पता है की उस द्वारिकाधीश ने क्या दिया !


सुदामाजी ने कुछ नही माँगा पर उस संकोचिनाथ ने इतना दिया की वे कल्पना भी नही कर सकते इसलिए इस नटखट से कुछ मांग कर इन्हे संकोच में मत डालिये
 एक भक्त ने तो इनका नाम भी संकोचिनाथ रख लिया इसलिए ये संकोचिनाथ है।
              { जय
जय श्री राधे }



Saturday, 11 October 2014

              रावण के पिछले जन्म की कथा  रावण पिछले जन्म में बहुत धर्मात्मा था , उस धर्मात्मा का नाम था ( प्रतापभानु )
प्रतापभानु ने संसार भर को अपनी भुजाओं के बल से वश में कर राजाओं से दंड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। उस समय सम्पूर्ण पृथ्वी मंडल का एकमात्र   प्रतापभानु ही (चक्रवर्ती) राजा था।

 राजा अर्थ, धर्म और काम आदि के सुखों का समयानुसार सेवन करता था ,
राजा प्रतापभानु का बल पाकर भूमि सुंदर कामधेनु (मनचाही वस्तु देने वाली) हो गई। (उनके राज्य में) प्रजा सब (प्रकार के) दुःखों से रहित और सुखी थी और सभी स्त्री-पुरुष सुंदर और धर्मात्मा थे।

वेदों में राजाओं के लिए जो धर्म बताए गए थे, राजा सदा आदर पूर्वक और सुख मानकर उन सबका पालन करता था। प्रतिदिन अनेक प्रकार के दान देता और उत्तम शास्त्र, वेद और पुराण सुनता था।

एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर, शिकार का सब सामान सजाकर विंध्याचल के घने जंगल में गया।
 राजा ने वन में फिरते हुए एक सूअर को देखा , उस सूअर को देखकर राजा घोड़े को चाबुक लगाकर तेजी से चला और उसने सूअर को ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता।

घोड़े को (अपनी तरफ) आता देखकर सूअर पवन वेग से भाग चला। राजा ने तुरंत ही बाण को धनुष पर चढ़ाया , धनुष पर बाण चढ़ा  देख सूअर  धरती में दुबक गया। वह पशु कभी प्रकट होता और कभी छिपता हुआ भाग जाता था।
 
वह , सूअर बहुत दूर ऐसे घने जंगल में चला गया, जहाँ हाथी-घोड़े का निबाह (गमन) नहीं था। राजा बिलकुल अकेला था और वन में क्लेश भी बहुत था , पर राजा ने भी उस सूअर का पीछा नही छोड़ा।


राजा को बड़ा धैर्यवान देखकर, सूअर भागकर पहाड़ की एक गहरी गुफा में जा घुसा। उसमें जाना कठिन देखकर राजा को बहुत पछताकर लौटना पड़ा, पर उस घोर वन में वह रास्ता भूल गया , बहुत परिश्रम करने से थका हुआ और घोड़े समेत भूख-प्यास से व्याकुल राजा नदी-तालाब खोजता-खोजता पानी बिना बेहाल हो गया।

वन में फिरते-फिरते उसने एक आश्रम देखा, वहाँ कपट से मुनि का वेष बनाए एक राजा रहता था,

जिसका देश राजा प्रतापभानु ने छीन लिया था और जो सेना को छोड़कर युद्ध से भाग गया था पर , राजा प्यासा होने के कारण (व्याकुलता में) उसे पहचान न सका। सुंदर वेष देखकर राजा ने उसे महामुनि समझा और घोड़े से उतर कर उसे प्रणाम किया, परन्तु बड़ा चतुर होने के कारण प्रतापभानु ने उसे अपना नाम नहीं बताया।

राजा को प्यासा देखकर उसने सरोवर दिखला दिया।
हर्षित होकर राजा ने घोड़े सहित उसमें स्नान और जलपान किया , राजा की  सारी थकावट मिट गई  सुखी हो गया। तब तपस्वी उसे अपने आश्रम में ले गया और सूर्यास्त का समय जानकर उसने (राजा को बैठने के लिए) आसन दिया।

 फिर वह तपस्वी कोमल वाणी से बोला ,
तुम कौन हो? सुंदर युवक होकर, जीवन की परवाह न करके वन में अकेले क्यों फिर रहे हो ?

प्रतापभानु ने अपना झूठा परिचय देते हुए  कहा हे मुनीश्वर ! सुनिए, प्रतापभानु नाम का एक राजा है, मैं उसका मंत्री हूँ। शिकार के लिए फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्य से यहाँ आकर मैंने आपके चरणों के दर्शन पाए हैं

यहाँ तुलसीदासजी कहते है  की जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह आप ही उसके पास आती है या उसको वहाँ ले जाती है ,

कपट मुनि ने प्रतापभानु से कहा- हे तात ! अँधेरा हो गया। तुम्हारा नगर यहाँ से सत्तर योजन पर है , हे सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सवेरा होते ही चले जाना

राजा प्रतापभानु   ने  सुंदर कोमल वाणी से कहा- हे प्रभो! आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम (धाम) विस्तार से बतलाइए ?

राजा ने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजा को पहचान गया था। राजा तो शुद्ध हृदय था पर वह कपट करने में चतुर था। एक तो वैरी, फिर जाति का क्षत्रिय, फिर वह छल-बल से अपना काम बनाना चाहता था

मुनि ने कपट में डुबोकर बड़ी युक्ति के साथ कोमल वाणी बोला-  वैसे तो हमारा नाम एक तनु है पर अब हमारा नाम भिखारी है, क्योंकि हम निर्धन और अनिकेत (घर-द्वारहीन है , उस कपट मुनि ने झूट को ऐसी मधुर वाणी से कहा की राजा उस पर मोहित हो गया और बोला ,
 मुनिवर! आप जो हों सो हों (अर्थात्‌ जो कोई भी हों), मैं आपके चरणों में नमस्कार करता हूँ। हे स्वामी! अब मुझ पर कृपा कीजिए।
 

अपने ऊपर राजा की स्वाभाविक प्रीति और अपने विषय में उसका अधिक विश्वास देखकर , सब प्रकार से राजा को अपने वश में करके, अधिक स्नेह दिखाता हुआ वह (कपट-तपस्वी) बोला- हे राजन्‌! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे यहाँ रहते बहुत समय बीत गया ,अब तक न तो कोई मुझसे मिला और न मैं अपने को किसी पर प्रकट करता हूँ, क्योंकि लोक में प्रतिष्ठा अग्नि के समान है, जो तप रूपी वन को भस्म कर डालती है ,
 और श्री हरि को छोड़कर किसी से कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता। प्रभु तो बिना जनाए ही सब जानते हैं। फिर कहो संसार को रिझाने से क्या सिद्धि मिलेगी।

ज्यों-ज्यों वह तपस्वी उदासीनता की बातें कहता था, त्यों ही त्यों राजा को विश्वास उत्पन्न होता जाता था।
जब उस बगुले की तरह ध्यान लगाने वाले (कपटी) मुनि ने राजा को कर्म, मन और वचन से अपने वश में जाना, तब वह बोला

 
हे भाई! हमारा नाम एकतनु है। यह सुनकर राजा ने फिर सिर नवाकर कहा- मुझे अपना अत्यन्त (अनुरागी) सेवक जानकर अपने नाम का अर्थ समझाकर कहिए ?

(कपटी मुनि ने कहा-) जब सबसे पहले सृष्टि उत्पन्न हुई थी, तभी मेरी उत्पत्ति हुई थी। तब से मैंने फिर दूसरी देह नहीं धारण की, इसी से मेरा नाम एकतनु है

राजा
( कपटी मुनि ) के नाम का अर्थ सुनकर उस तपस्वी के वश में हो गया और वह उसे अपना नाम बताने लगा।

 कपटमुनि ने कहा- राजन ! मैं तुमको जानता हूँ। तुमने कपट किया, वह मुझे अच्छा लगा , अब मैं तुम्हारा परिचय तुम्हे सुनाता हूँ सुनो।

 हे राजन ! तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे। हे राजन ! गुरु की कृपा से मैं सब जानता हूँ, पर अपनी हानि समझकर कहता नहीं और अब मैं प्रसन्न हूँ, इसमें संदेह न करना। हे राजन्‌! जो मन को भावे वही वर  माँग लो।

 सुंदर (प्रिय) वचन सुनकर राजा हर्षित हो गया और (मुनि के) पैर पकड़कर उसने बहुत प्रकार से विनती करके कहने लगा हे मुनिवर ! अब मैं आपको अपना गुरु मानता हूँ आप मुझे कृपा पूर्वक वर दीजिये ,
 राजा कहने लगा हे प्रभो! मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःख से रहित हो जाए, मुझे युद्ध में कोई जीत न सके और पृथ्वी पर मेरा सौ कल्पतक एकछत्र अकण्टक राज्य हो ऐसा वार दीजिये। 
 

कपटमुनि ने कहा - हे राजन्‌! ऐसा ही हो, पर एक बात कठिन है, उसे भी सुन लो। हे पृथ्वी के स्वामी! केवल ब्राह्मण कुल को छोड़ काल भी तुम्हारे चरणों पर सिर नवाएगा , तप के बल से ब्राह्मण सदा बलवान रहते हैं। उनके क्रोध से रक्षा करने वाला कोई नहीं है। हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणों को वश में कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जाएँगे।

राजा कपट मुनि की बात सुन कर उनको गुरु मानते हुए प्रश्न करने लगे की हे स्वामी
वे ब्राह्मण किस प्रकार से वश में हो सकते हैं, कृपा करके वह भी बताइए।

कपटमुनि ने कहा -हे राजन्‌! वह युक्ति तो मेरे हाथ है, और मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, जगत में मुझे कुछ भी दुर्लभ नहीं है पर मेरा जाना तुम्हारे नगर में हो नहीं सकता। जब से पैदा हुआ हूँ, तब से आज तक मैं किसी के घर अथवा गाँव नहीं गया हूँ
पर मैं तुम्हारा कार्य सिद्ध करने के लिए तुम्हारे घर अवश्य आऊंगा।

अब मैं तुमसे कहता हूँ  वो ध्यान से सुनो , तुम्हारे यहाँ
नित्य नए एक लाख ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रित करना। मैं तुम्हारे सकंल्प (के काल अर्थात एक वर्ष) तक प्रतिदिन भोजन बना दिया करूँगा , मेरे हाथो बना भोजन ग्रहण करके सभी ब्राह्मण तुम पर प्रसन्न हो कर थोड़े ही परिश्रम से सब ब्राह्मण तुम्हारे वश में हो जाएँगे।

उस दुष्ट ने पिछला बैर याद करके (षड्यंत्र किया) और जिस प्रकार शत्रु का नाश हो, वही उपाय रचा। भावीवश राजा (प्रतापभानु) कुछ भी न समझ सका

जो सूअर था वो कपट मुनि का मित्र हि था , जो महा मायावी था उसी मायावी ने सुअर का भेस धारण कर राजा को घोर जंगल में ले आया था ,


उस रात प्रतापभानु उस कपटमुनि के आश्रम में ही सो गया था , रात गहरी होने के बाद उस कपट मुनि ने अपने मित्र सूअर (कालकेतु) को आज्ञा दी की अब तुम इस राजा को अपने राज्य में पंहुचा कर आ जाओ। 

उसने प्रतापभानु राजा को घोड़े सहित क्षणभर में घर पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास सुलाकर घोड़े को अच्छी तरह से घुड़साल में बाँध दिया , और उस राजा के पुरोहित को उठा ले गया और माया से उसकी बुद्धि को भ्रम में डालकर उसे उसने पहाड़ की खोह में ला रखा

वह आप पुरोहित का रूप बनाकर उसकी सुंदर सेज पर जा लेटा। राजा सवेरा  होने से पहले ही जागा और अपना घर देखकर उसने बड़ा ही आश्चर्य माना

 वह पुरोहित के रूपमे आकर ब्रामणो के लिए छह रस और चार प्रकार के भोजन, जैसा कि वेदों में वर्णन है, बनाए। उसने मायामयी रसोई तैयार की और इतने व्यंजन बनाए, जिन्हें कोई गिन नहीं सकता

 उस कपट मुनि ने अनेक प्रकार के पशुओं का मांस पकाया और उसमें उस दुष्ट ने ब्राह्मणों का मांस मिला दिया। सब ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलाया और चरण धोकर आदर सहित बैठाया।

ज्यों ही राजा परोसने लगा,

उसी काल (कालकेतुकृत) आकाशवाणी हुई- हे ब्राह्मणों! उठ-उठकर अपने घर जाओ, यह अन्न मत खाओ। इस अन्न को ( खाने) में बड़ी हानि है
रसोई में ब्राह्मणों का मांस बना है।

 (आकाशवाणी का) विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया (परन्तु), उसकी बुद्धि मोह में भूली हुई थी। होनहारवश उसके मुँह से (एक) बात भी न निकली

तब ब्राह्मण क्रोध सहित बोल उठे- उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया- अरे मूर्ख राजा! तू जाकर परिवार सहित राक्षस हो।
रे नीच क्षत्रिय! तूने तो परिवार सहित ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें नष्ट करना चाहा था, ईश्वर ने हमारे धर्म की रक्षा की। अब तू परिवार सहित नष्ट होगा
, एक वर्ष के भीतर तेरा नाश हो जाए, तेरे कुल में कोई पानी देने वाला तक न रहेगा। शाप सुनकर राजा भय के मारे अत्यन्त व्याकुल हो गया। फिर सुंदर आकाशवाणी हुई ,

हे ब्राह्मणों! तुमने विचार कर शाप नहीं दिया। राजा ने कुछ भी अपराध नहीं किया। आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गए। तब राजा वहाँ गया, जहाँ भोजन बना था

(देखा तो) वहाँ न भोजन था, न रसोइया ब्राह्मण ही था। तब राजा मन में अपार चिन्ता करता हुआ लौटा। उसने ब्राह्मणों को सब वृत्तान्त सुनाया और (बड़ा ही) भयभीत और व्याकुल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।

ब्राह्मण बोले ,
हे राजन! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनहार नहीं मिटता। ब्राह्मणों का शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता

उसके बाद प्रतापभानु को उस  शत्रु कपट मुनि ने चारो और से घेरकर उनके वंस का नास कर दिया और वो प्रतापभानु की राज गद्दी पर बैठ गया ,
 

वे प्रतापभानु ही अपने परिवार सहित राक्षस बने जो रावण , कुम्भकर्ण खरदूषण और सूर्पनखा थी इन सभी का गर्भ स्थापित भी सध्या काल में हुआ।  संध्या काल में गर्भ स्थापित होने वाले जीव राक्षस प्रवति के ही होते है , इस  परिवार में एक धर्मात्मा विभीषणजी भी थे जिनका गर्भ स्थापित सध्या काल में नही हुआ।

इस कथा का लेखन स्वामी श्री तुलसीदास गोस्वामी जी ने अपनी रामचरित्रमानस में किया है ,( मैं हरिदासी ) उन पुराणपुर्शोतम को वंदन करती हूँ !! जय श्री राम !    
{ जय श्री राधे राधे }
प्रियतम  मीठी  नित  याद  तुम्हारी आती !
मैं  पल  भर  कभी तुम्है  बिछार  न  पाती !!

आजारे  मन  मीत  साँवरे , आरत हो  के  पुकारू !
मैं निशदिन तेरा ध्यान धरु, अरु रोज ही पंत निहारु !!

कब आएगा तू ही  बता दे , बात रही  अब  तेरी !
मेरी तूने एक न मानी ,समझी अपन से न्यारी !!
 

अखिया सावन बदरा बरसे , आश लगी मोहे तेरी !
दिना  नाथ  दयाकर  मोहन ,  मैं  दासी  हूँ  तेरी ! !

हृदय  पीर  पिव तोहे मिलन की , रोम रोम  अकुलावे !
रो - रो कर में तुझे पुकारू , श्याम धणी क्यों नही आवे ?!!

और भगतन को दर्शन दे पिव पीर मिटाई भारी !
अब मेरी  बारी  आई तो , नाक सूज गयी  थारी !!

तू अंतर्यामी है  श्यामा , क्या  तू  समझ नही पावे !
मेरे हृदय पीर पिव भारी , क्या तू जान नही पावे !!

क्या मोसे कछु भूल  हो गयी , या  तू माया  डारि !
तू कहवे तो कान पकड़लूं ,  खोल आँख अब थारी !!

दासी के प्रभु श्यामा सांवरे , पीर समझ अब मोरी !
जल्दी आना देर न करना , दासी , के श्याम मुरारी!!

{  जय श्री राधे राधे }

Thursday, 2 October 2014

  

                  रावण मार राम घर आये....!
                उसके बाद प्रभु श्री राम के पूछने पर अगस्त्य मुनि के मुख से रावण और कुम्भकरण के जन्म की कथा सुन ना..!!


जब प्रभु श्री राम का  राज्याभिषेक हुआ उनके कुछ दिनों बाद अगस्त्य ऋषि आये , अगस्त्य ऋषि को भगवान ने सभी सभा सहित उठ खड़े हुए और भगवान ने प्रणाम करके कहा
 ऋषिवर ! आपका स्वागत है कहिये मैं आप की क्या सेवा करू तथापि  इस भूमण्डल पर कही कोई  ऐसा प्राणी नही है जो आपकी तपश्या में विघ्न डाल सके , मुनिवर ! आप धर्म के साक्षात विग्रह है लोभ तो आप को छू भी नही गया , बताईये मैं आपका कौन - सा कार्य करूँ ? मुनिवर ! यदपि आप की तपश्या के प्रभाव से ही सारे कार्य सिद्ध हो जाते है तथापि मुझ पर कृपा करके ही मेरे लिए कोई सेवा बताईये।
भगवान से आदर पा कर मुनि बहुत प्रसन्न हुए और
भगवान से अत्यंत विनययुक्त वाणी में बोले , हे दशरथनंदन  मुझे कोई कष्ट नही है कष्ट देने वाला एक ही राक्षस था जिसे आपने मार कर सभी ऋषि मुनियों को अभयदान दे दिया है , हे राजाधिराज ! आपका दर्शन देवताओं को भी  दुर्लब है यही सोच कर मैं यहाँ आया हूँ हे स्वामिन ! अब आप मुझे अपने दर्शन के लिए ही आया समझिए।

 तब प्रभु ने अगस्त्य जी को आदर सहित आसन पर बिठा कर ऋषि से पूछा की मुनिवर ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ , वो रावण और कुम्भकरण कौन थे और किस कुल के थे  जिसका मेने वध किया था , आप कृपा कर के विस्तार से बताईये।

तब ऋषि ने कहा प्रभो ! आप सब कुछ जानते ही है फिर भी आप मुझे मान दे कर मुझसे कुछ जानना चाहते है तो में बता ता हूँ ,
ऋषि ने कहा प्रभो !
सम्पूर्ण सृष्टि करने वाले ब्रह्मा जी है उनके पुत्र महर्षि पुलस्त्य हुए पुलस्त्यजी से मुनिवर विश्रवा का जन्म हुआ उनकी दो पत्निया थी जो बड़ी पतिव्रता और  सदाचारिणी थी , उनमे से एक का नाम ( मन्दाकिनी ) था और दूसरी ( कैकसी ) नाम से प्रसीद थी।  पहली पत्नी मन्दाकिनी  के गर्भ से 

( कुबेर ) का जन्म हुआ जो लोकपाल के पदको प्राप्त हुए है उन्होंने भगवान शंकर जी से प्रसाद पा कर लंका पुरी को अपना निवास - स्थान बनाया था , और कैकसी के गर्भ से रावण कुम्भकरण हुए , रावण और कुम्भकरण का ,
संध्या काल में गर्भ स्थापित हुआ सो
 ये दुष्ट राक्षस प्रवति के हुए और विभीषण जी धर्मात्मा थे , ये सब ब्रह्माजी के परपौत्र थे ,
एक दिन की बात है ( कुबेर ) अपने माता पिता से मिलने आये थे , वे अपने माता -पिता के चरणो  में बहुत समय तक बैठे रहे और फिर उनको प्रणाम कर अपने मन की गति से चलने वाले विमान पर चढ़ कर चले गए।

 कुबेर को अपने पिता के चरणो मे बैठा देख रावण ने अपनी माँ से पूछा की माँ ! ये कौन था जो मेरे पिता को प्रणाम कर के गया और उनका विमान तो वायु की गति से भी तेज चल रहा था ?

रावण की माँ ने क्रोध में भरकर कहा अरे ! ये मेरी शोत का बेटा है जो शंकर जी की कृपा से लंका का राज्य और मन की गति से चलने वाला विमान प्राप्त कर अपनी माता का गौरव बढ़ाया है , तुम जैसे नही तुम अभागो ने मेरी कोख से जन्म लिए जो कीड़े की
भांति रेंगते हुए इधर उधर फिरते रहते हो ,तुम अपने सौतेले भाई ( कुबेर ) की बराबरी नही कर सकते..!

माँ की बात सुन कर रावण को बहुत दुःख हुआ और माँ से कहने लगा माँ ! ये कीड़े सी हस्ती रखने वाला ( कुबेर ) किस गिनती में आता है , मैं  ( दस  हजार साल ) तपश्या कर पुरे त्रिलोकी का स्वामी न बन जाऊ तो मुझे ( पितृ ) दोस लगे , इतना कह कर रावण तपश्या के लिए निक गया उसके पीछे - पीछे  कुम्भकरण और विभीषण भी तपश्या करने चले गए। 

 विभीषणजी धर्मात्मा थे जो उन्होंने ब्रम्हाजी से भगवान की भक्ति मांगी ,
रावण राक्षसी प्रवति का था सो उसने ब्रह्मा जी से अमर होना का वरदान माँगा पर ,

 ब्रह्मा जी ने कहा ,
जो जन्म लेता है उसे मारना ही पड़ता है इसलिए में तुम्हे अमर होने का वरदान नही दे सकता फिर कहा अच्छा ! आप मुझे अमर होने का वरदान नही दे सकते तो इतना दे दीजिये की किसी साधारण मनुष्य के हाथो मेरी मृत्यु न हो , केवल नारायण के हाथो ही मेरी मृत्यु हो , ब्रह्माजी ने कहा तथास्तु ! ऐसा ही हो ,
  फिर उसने बल बुद्धि और त्रिलोक में उनके लिए कुछ भी पाना दुर्लब न हो ,  युद्ध में किसी नर के हाथो मेरी पराजय न हो , ब्रह्मा जी और शंकर जी से ऐसा वरदान माँग कर वो पुरे त्रिलोकी को अपने वष में कर दिया !
   
फिर कुम्भकरण इन्द्राश्न चाहता था , ब्रह्माजी ने सोचा की ये राक्षस मांस भक्षी है , इंद्र आशन पर बैठ गया तब तो कुछ ही दिनो मे पूरी सृष्टि को नस्ट कर देगा , इसलिए ब्रह्माजी और इंद्र की प्रार्थना से देवी सरस्वती उनकी जीवा पर विराजित हो गयी और इन्द्राश्न की जगह जीवा लड़कड़ते हुए कहा , पिता श्री ! मुझे निंदराशन दे दीजिये ,
ब्रह्माजी ने झट से कहा तथास्तु ! ऐसा ही हो , तुम सदा निंदराशन में रहो ,  जीवन भर सोते ही रहो !
'कुम्भकरण हड़बड़ा कर बोले अरे ! ये मेरे मुँह से क्या निकल गया मेरी गलती क्षमा करे मुझे निंदराशन नही , इंद्र - आशन चाहिए , ब्रह्माजी ने कहा अब कुछ नही हो सकता तुमने जो कहा मेने वरदान दे दिया और मैं वरदान दे कर पलटता नही।
'रावण गबराय की अगर इसने जिद करके ब्रह्माजी से पाये वरदान को उल्ट पलट करवा दिया तो मेरे भी सारे वरदान उलटे हो जायेंगे ये सोच कर रावण ने ब्रह्माजी से प्रार्थना कर कहा देव ! आप ने जो दिया वो ठीक है बस ये अपने शरीर को जीवित रख सके उसका उपाय बता दीजिये ?


तब बहुत प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी ने कहा अच्छा हाँ ! तुम्हारे निंदराशन को कुछ कम कर सकता हूँ , कुम्भकरण आतुर हो कर बोले हाँ ! हाँ ! महाराज ये ठीक रहेगा।
ब्रह्माजी बोले तुम छः महीनो तक निंद्रा में सोये रहोगे और उसके बाद एकबार निंद्रा से जागने के बाद भोजन करके फिर घोर निंद्रा मे सो जाओगे
।
कुम्भकरण ब्रह्माजी की बात सुन कर बैठा - बैठा सिर पीटने लगा की ये क्या हो गया , क्या पाने चला था और क्या ले बैठा।

फिर कुछ समय बीत जाने के बाद रावण ने कुबेर का रथ छीन लिया और कुटिलता से लंका पर डेरा जमा दिया।
ऋषि कहते है प्रभो ! उसी रावण को आपने समापन किया है उसके अत्याचार से पुरे त्रिलोकी में हा - हा कार मचा हुआ था जो आपने कृपा कर उस दुष्ट को पुरे राक्षसो सही जड़ से उखाड़ कर फेक दिया और अपने 
भक्तो को अभय दान प्रदान कर उनका गौरव बढ़ाया है।
ये कथा अगस्त्य  ऋषि ने भगवान श्री रामजी के पूछने पर ( प्रभु श्रीराम को , श्रीराम दरबार ) में सुनाई थी ! जय श्री सीताराम !!

  { जय जय श्री राधे }


Tuesday, 23 September 2014



       सुखी रहो निंदक सदा , पूर्ण हो हर काम !
       निंदा से हर पाप कटे , मिले प्रभु निज धाम
!!  

अपने आपको सुखी अथवा निष्पाप करना हो तो लोगोको अपनी तरफ से छुट्टी दे दो की खूब निंदा करो , निंदा करने वालो का विरोद मत करो , कोई झूटी निंदा करे तो चुप रहो सफाई मत दो , सत्यकी सफाई देना सत्यका निरादर है ,

दूसरे हमे ख़राब समझे तो इसका कोई मूल्य नही है , भगवान दूसरोंकी गवाही नही लेते , दूसरा आदमी अच्छा कहे तो हम अच्छे होजाएंगे ऐसा कभी होगा नही
हमारे मनमे एक ही भाव हो , की
'हे नाथ ! मेरे कर्मोंका आप कितना खयाल रखते है की मैंने न जाने किस - किस जन्मोंमे किस - किस परिथिति में परवश होकर क्या - क्या कर्म हिये है , उन सम्पूर्ण कर्मोसे सर्वथा रहित करनेके लिए आप कितना विचित्र विधान करते है ! मैं तो आपके विधानको किंचिमात्र भी समझ नही सकती और मुझमे आपके विधानको समझनेकी शक्ति भी नही है।, इसलिए हे प्राणधन ! मैं उसमे अपनी बुद्धि क्यों लगाऊ , मुझे तो केवल आपकी तरफ ही देखना हैं , कारण की आप जो कुछ विधान करते हैं उसमे आपका ही हाथ रहता है अथवा वह आपका ही किया हुआ होता है , जो की मेरे लिए परम मंगलमय , आनंदमय है ,
'हे भक्तो के प्राण धन , भक्तवत्सल भगवान ! आप कभी जीव का अहित नही करते
इसलिए सच्चे हृदय से स्वीकार करलो की
हमे जो भी मिलता है , भला , बुरा , सुख ,दुःख सब हमारे कर्मोंके अनुसार ही मिलता है इसलिए हर पल , हर परिथिति में भगवान का सुक्रिया अदा करते रहना चाहिए....!!

        { जय जय श्री राधे }